मसूर, तूअर, उड़द, चना भी एमएसपी पर खरीदेंगे, किसानों के पसीने की पूरी कीमत चुकाएंगे- केंद्रीय कृषि मंत्री

27 November, 2025, 9:43 pm


मोगा, 27 नवंबर : केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान आज एक दिवसीय पंजाब दौरे पर हैं। इस दौरान केंद्रीय मंत्री ने मोगा के रणसिंह कलां गांव के किसान भाई-बहनों,ग्रामवासियों और हितधारकों से मुलाकत कर विगत 6 वर्षों से पराली ना जलाने और पराली के उचित प्रबंधन में अभूतपर्व उपलब्धि के लिए सभी की सराहना की और बधाई दी।

मुख्य आयोजन के पहले केंद्रीय मंत्री ने मीडिया से भी बात की और बताया कि पराली जलाने की घटनाओं ने पूरे देश को चिंतित किया था। पराली जलने के कारण खेत तो साफ हो जाता था, लेकिन मित्र कीट भी जल जाते थे। साथ ही पराली जलाने से प्रदूषण की समस्या भी पैदा होती थी।“

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि “मैं आज पंजाब को बधाई देने आया हूं। पंजाब के पराली प्रबंधन के प्रयोग को सारे देश में ले जाने आया हूं। पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में इस साल 83 प्रतिशत की कमी आई है। जहां लगभग 83 हजार पराली जलाने की घटनाएं होती थी वह अब घटकर 5 हजार के करीब हो चुकी हैं।“

आगे, केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि “किसान भाई-बहन पूछते हैं कि पराली ना जलाएं तो विकल्प क्या है? गेहूं और अन्य फसल की बुवाई के लिए खेत साफ कैसे करें? इन सवालों के समाधानों के लिए रणसिंह कलां गांव में प्रयोग हुए हैं। रणसिंह कलां गावं ने उदाहरण पेश किया है। यहां पिछले 6 वर्षों से पराली नहीं जलाई गई है, यहां किसान भाई-बहन सीधे पराली को खेत में मिलाते हैं और डायरेक्ट सीडिंग करते हैं।“

मुख्य कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री श्री चौहान ने कहा कि मैंने कुछ दिन पहले रणसिंह कलां गांव के बारे में पढ़ा। यहां पराली को बोझ नहीं माना गया, बल्कि इसे वरदान में बदल दिया गया। रणसिंह कलां गांव एक ऐसा उदाहरण है जो मांगने में नहीं बल्कि देने में विश्वास रखता है। उन्होंने कहा कि कृषि मंत्री होने के नाते वह किसानों और खेतों में जाकर सीधे किसानों से संवाद करना आवश्यक समझते हैं क्योंकि इसके बिना सही रूप से किसान कल्याण के लिए काम नहीं किया जा सकता।  

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पराली जलाने के बाद खेतों में पानी डालना पड़ता है उसके बाद खेत बुवाई के लिए तैयार किए जाते हैं वहीं रणसिंह कलां गावं की भांति प्रबंधन करने से हैप्पी सीडर से कटाई और खेतों में पराली मिला देने के बाद बिना पानी दिए डायरेक्टर सीडिंग की जा सकती है। इससे पानी और डीजल दोनों की बचत होती है। पराली में पोटाश होता है, जो खेतों में मिलकर उसे फायदा पहुंचाता है। खरपतवार नहीं होता। जमीन में नमी बनी रहती है। खेतों में पराली मिलाने से जैविक कार्बन बढ़ता है। खाद की आवश्यकता कम पड़ती है। केंद्रीय मंत्री ने बताया कि सरपंच ने जानकारी दी कि जहां पहले डीएपी डेढ़ गट्टे डालते थे वहीं अब एक डीएपी गट्टे की जरूरत पड़ती है वहीं 3 यूरिया गट्टे की जगह 2 गट्टे हीं खेत में मिलाने पड़ते हैं। यह स्पष्ट रूप से खर्च में बचत का प्रमाण है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि उन्होंने खेतों का निरीक्षण करके भी देखा। पराली खेत में ही मिलाने से फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। प्रति एकड़ 20 से 22 क्विंटल उत्पादन संभावित रहता है।

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि मात्र गेहूं ही नहीं बल्कि आलू की खेती में भी पराली प्रबंधन का यह प्रयोग अत्यधिक फायदेमंद है। उन्होंने कहा कि किसान भाई ने बताया कि जहां आलू की बुवाई में खेतों में पोटाश डालने की आवश्यकता पड़ती थी, वहीं अब इसकी जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि पराली से जिंक और पोटाश की जरूरत पूरी हो जाती है। आलू का आकार भी बड़ा होता है, गुणवत्ता अच्छी हो जाती है और खर्चा भी कम होता है।