मुस्लिम महिलाएँ चाहती हैं कि बहुविवाह पूरी तरह समाप्त हो

भारतीय मुस्लिम महिलाएँ एवं प्रगतिशील नागरिकों ने बहुविवाह (Polygamy) पर कानूनी प्रतिबंध की मांग को तेज़ कर दिया है। 2025 की भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA) की राष्ट्रीय रिपोर्ट के आधार पर पेश यह मांग सिर्फ एक सामाजिक सुधार नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों, लैंगिक समानता और मानवीय गरिमा की पुकार बनकर सामने आई है।
यह रिपोर्ट देश के 7 राज्यों में 2,500 मुस्लिम महिलाओं के अनुभवों और साक्षात्कारों पर आधारित है, जो बहुविवाह की शिकार रही हैं। इसके आंकड़े बताते हैं कि बहुविवाह कोई धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ संरचनात्मक अन्याय और शोषण प्रणाली बन चुका है।
BMMA 2025 रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
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85% मुस्लिम महिलाएँ चाहती हैं कि बहुविवाह पूरी तरह समाप्त हो
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87% महिलाएँ इसे अपराध घोषित करने की मांग कर रही हैं
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79% पहली पत्नियों को पति की दूसरी शादी की कोई जानकारी नहीं दी गई
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88% मामलों में पत्नी की सहमति के बिना दूसरी शादी की गई
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54% पहली पत्नियाँ दूसरी शादी के बाद त्याग दी गईं
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36% को कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली
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47% महिलाएँ मजबूर होकर मायके लौटने को विवश हुईं
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93% महिलाएँ बाल विवाह पर भी सम्पूर्ण रोक चाहती हैं
ये आंकड़े साफ करते हैं कि बहुविवाह की प्रथा आज महिलाओं के लिए भावनात्मक आघात, आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक बहिष्कार का बड़ा कारण बन चुकी है।
बहुविवाह पर प्रतिबंध क्यों जरूरी?
1. कानून की नजर में समानता
भारत में अन्य सभी धर्मों में बहुविवाह पर रोक है। ऐसे में मुस्लिम महिलाओं को अलग और कमजोर अधिकार देना संविधान का उल्लंघन है।
2. लैंगिक न्याय और मौलिक अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14, 15 और 21 समानता, सम्मान और जीवन के अधिकार की गारंटी देता है। कोई भी व्यक्तिगत कानून इन अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकता।
3. धर्म के नाम पर शोषण नहीं
इस्लाम न्याय, करुणा और जिम्मेदारी की शिक्षा देता है, न कि पुरुषों को महिलाओं पर मनमाना अधिकार। धर्म का दुरुपयोग कर शोषण को वैध ठहराना स्वीकार नहीं।
4. समान नागरिक कानून की दिशा में कदम
सभी के लिए एक समान विवाह कानून लोकतंत्र और सामाजिक समरसता को मज़बूत करेगा।
सरकार से प्रमुख मांगें
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भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 के तहत बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया जाए, जिसमें 7 साल तक की सजा का प्रावधान है।
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सभी विवाहों का पंजीकरण अनिवार्य किया जाए।
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बहुविवाह से प्रभावित महिलाओं और बच्चों को भरण-पोषण, संपत्ति और आवास का अधिकार मिले।
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पीड़ित महिलाओं के लिए मुफ्त कानूनी सहायता, परामर्श और पुनर्वास केंद्रों की व्यवस्था हो।
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समुदाय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएँ ताकि यह सुधार सम्मान और संवेदनशीलता के साथ लागू हो।
एकजुटता की अपील
इस अभियान में मुस्लिम संगठनों, महिला समूहों, छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, अधिवक्ताओं और आम नागरिकों से जुड़ने की अपील की गई है।
BMMA रिपोर्ट सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि हज़ारों महिलाओं के दर्द और संघर्ष की आवाज़ है, जिसे अब अनदेखा नहीं किया जा सकता।
अब सवाल सिर्फ कानून का नहीं, इंसानियत, सम्मान और न्याय का है।
न्याय का समय अब है।




