साइंस फेस्टिवल के आखिरी दिन जीन एडिटिंग ने बटोरी सुर्खियां

9 December, 2025, 9:30 pm



पंचकूला, 09 दिसंबर 2025: इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल-2025 (आईआईएसएफ) के आखिरी दिन जीन एडिटिंग ने सुर्खियां बटोरी। साइंस फेस्टिवल में विशेषज्ञों ने भारत के जेनेटिक इनोवेशन रोडमैप पर चर्चा की।
इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल में शोधकर्ता, छात्र और इनोवेटर्स ने इस साइंस फेस्टिवल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत@2047 के विजन को गति देने पर चर्चा की। फेस्टिवल में हज़ारों युवाओं ने अपनी भागीदारी सुनिश्चित करके साइंस इनोवेशन और वैज्ञानिक प्रगति को राष्ट्रीय विकास के साथ जोड़ने में रूचि दिखाई।

मुख्य वक्ताओं ने समझाया विज्ञान और उसकी क्षमता

सेशन की शुरुआत विशषज्ञों के व्याख्यान के साथ हुई, जिसमें आईसीएआर-एनबीपीजीआर के पूर्व निदेशक डॉ. केसी बंसल, आईसीजीईबी के निदेशक डॉ. रमेश वी सोंटी और आईआईटी बांबे के डॉ. राहुल पुरवार शामिल हुए, जो भारत की पहली सीएआर-टी सेल थेरेपी कंपनी इमिनुयो एक्ट के प्रमुख भी हैं।

डॉ. बंसल ने जीन एडिटिंग की खोज के बाद से इसके तेज़ी से विकास पर चर्चा की और कृषि में वैज्ञानिक भागीदारी के ज़रिए आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए जरूरी बताया। उन्होंने बताया कि फेस्टिवल का थीम, "विज्ञान से समृद्धि, आत्मनिर्भर भारत के लिए," आहार की उपलब्धता और उसे सस्ता बनाने से जुड़ी है। फूड सिस्टम में साइंटिफिक प्रोग्रेस के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि जैसा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने बताया है, भारत की 80 करोड़ से ज़्यादा नागरिकों को हर महीने मुफ्त खाना देने की क्षमता दशकों की रिसर्च पर आधारित फसल सुधार पर टिकी है। उन्होंने कहा कि मज़बूत कृषि आधार के बिना, मेडिकल रिसर्च और स्पेस साइंस सहित दूसरे सेक्टर अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर सकते।

डॉ. सोंटी ने जीनोम एडिटिंग को डीएनए को फिर से लिखने का एक तरीका बताया, जिसमें टेक्स्ट में अक्षर बदलने की तरह ही सीक्वेंस को हटाया और डाला जाता है। उन्होंने बताया कि इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अब सिर्फ़ खेती में ही नहीं, बल्कि इंडस्ट्रियल माइक्रोब्स डेवलप करने, नए मटीरियल बनाने और यहां तक कि केमिकल प्रोसेस को बायोलॉजिकल प्रोसेस से बदलने में भी किया जा रहा है।

डॉ. पुरवार ने भारत की सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल सफलताओं पर चर्चा करते हुए सीएआर-टी सेल थेरेपी के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि विदेश में इलाज का खर्च कई करोड़ रुपये आता है, जबकि भारतीय वैज्ञानिकों की सालों की मेहनत से इस थेरेपी का खर्च उसके मुकाबले बहुत कम हो गया है। उन्होंने एक ऐसे मामले का ज़िक्र किया, जिसमें एक मरीज़ नाकाम इलाज के बाद न्यूज़ीलैंड से आया था और मेड इन इंडिया सीएआर-टी थेरेपी लेने के बाद अब कैंसर-फ्री है। उन्होंने कहा कि जो इनोवेशन कभी साइंस फिक्शन लगते थे, वे अब भारतीय लैब्स में हकीकत बन गए हैं।

पैनल ने जेनेटिक साइंस पर की चर्चा

पैनल चर्चा में नारायणा नेत्रालय और ग्रो-रिसर्च लैब के डॉ. अर्कासुभ्रा घोष, सीएमसी वेल्लोर के डॉ. मोहन कुमार के. मुरुगेसन और टीआईएफआर के डॉ. महेंद्र सोनावने शामिल हुए, जिसका संचालन एनआईपीजीआर के डॉ. नवीन चंद्र बिष्ट ने किया।

डॉ. घोष ने आंख, दिमाग और खून को प्रभावित करने वाली वंशानुगत बीमारियों के इलाज में चल रहे काम के बारे में चर्चा की और बताया कि जीन एडिटिंग टूल्स मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी बीमारियों के लिए सुधार वाले समाधान दे सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इस क्षेत्र में भारत का पहला जीन थेरेपी क्लिनिकल ट्रायल शुरू करने की योजनाएं चल रही हैं।

डॉ. सोनावणे ने विस्तार से बताया कि सीआरआईएसपीआर-सीईएस 9 (CRISPR CAS-9) जैसे टूल्स का इस्तेमाल जीन को बंद करने और आंत और दूसरे सिस्टम पर उनके असर का अध्ययन करने के लिए कैसे किया जाता है। उन्होंने रिसर्च मॉडल के तौर पर ज़ेब्राफिश की भूमिका पर ज़ोर दिया और बिना इनवेसिव एक्सपेरिमेंट के इंसानी बायोलॉजी का अध्ययन करने के लिए ऑर्गेनॉइड्स के बढ़ते इस्तेमाल पर भी चर्चा की।

डॉ. मुरुगेसन ने मरीज़ की अपनी खून बनाने वाली कोशिकाओं में डीएनए को काटे बिना जेनेटिक म्यूटेशन को ठीक करने के प्रयासों पर ज़ोर देते हुए बताया कि यह एक ऐसा तरीका है जिसे डीएनए टूटने से जुड़ी जटिलताओं से बचने और एक बार के इलाज की ओर बढ़ने के लिए डिज़ाइन किया गया है।


आईआईएसएफ का नई आशा के साथ हुआ समापन

साइंस फेस्टिवल का आखिरी दिन खास रहा, जीन एडिटिंग पर हुआ सेशन अपनी साइंटिफिक गहराई और राष्ट्रीय मकसद के मेल की वजह से सबसे आकर्षक का केंद्र बना। चर्चाओं में यह बात सामने आई कि भारत जेनेटिक टेक्नोलॉजी में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, साथ ही एक इनोवेटिव, आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने के बड़े लक्ष्य पर भी दृढ़ है। विशेषज्ञों और युवा प्रतिभागियों के बीच बातचीत साइंस फेस्टिवल- 2025 का एक शानदार समापन था, जिसने 2047 तक आने वाले दशकों में वैज्ञानिक प्रगति के प्रति साझा प्रतिबद्धता को मज़बूत किया।