मेरे लेखन की आत्मा मेरे जीवन के अनुभव हैं: कवि अब्बास क़मर

27 January, 2026, 4:30 pm

 

युवा उर्दू कवि अब्बास क़मर 30 जनवरी को थिंकर्स कलेक्टिव के आमंत्रण पर चंडीगढ़ में अपनी रचना ‘रोमांस ऑफ़ रेसिस्टेंस’ का पाठ करेंगे। अब्बास मानते हैं कि कविता संवेदना, सजगता और नैतिक कल्पना को विकसित करती है — जो आज के दौर में बेहद दुर्लभ लेकिन अत्यंत आवश्यक गुण हैं।

राजनीति शास्त्र के शोधार्थी अब्बास क़मर की रुचि संस्कृति और राजनीति के अंतर्संबंधों में है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया से शिक्षा प्राप्त की है। वे रेख़्ता फ़ाउंडेशन के संपादकीय विभाग में तीन वर्षों तक कार्य कर चुके हैं। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं:

 

सवाल: उर्दू भाषा से आपका लगाव कैसे शुरू हुआ? और कब महसूस हुआ कि कविता ही भावों को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है?

उत्तर:उर्दू से मेरा जुड़ाव घर से ही शुरू हुआ। मेरे ननिहाल के दादा धार्मिक कविता (रसाई अदब) लिखते थे और वही मेरी पहली प्रेरणा बने। बचपन से ही ग़ज़लें और सलाम मेरे वातावरण का हिस्सा थे। भाषा की गहराई और भावनात्मक सूक्ष्मता ने मुझे आकर्षित किया। 2014 में दिल्ली में कॉलेज के पहले वर्ष के दौरान मुझे एहसास हुआ कि कविता ही उन भावनाओं को सबसे ईमानदारी से व्यक्त कर सकती है, जिन्हें गद्य में कहना कठिन होता है।

सवाल 2: आपकी कविताओं में सामाजिक और राजनीतिक चेतना भी दिखती है। क्या आप इसे सोच-समझकर गढ़ते हैं?

उत्तर:
मैं इन तत्वों को अलग-अलग खांचों में नहीं बांटता। सामाजिक और राजनीतिक चिंताएं जीवन के अनुभवों से स्वतः निकलती हैं। कविता मेरे लिए वह स्थान है जहां निजी संवेदना और सामूहिक बेचैनी एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं।

 

सवाल 3: आपके लेखन में जीवन अनुभवों की क्या भूमिका है?

उत्तर:
मेरे लेखन का मूल आधार मेरे जीवन अनुभव हैं। वही मेरी रचनाओं को प्रामाणिकता और नैतिक आधार देते हैं। भले ही कविता अमूर्त दिशा में जाए, वह वास्तविक अनुभवों से जुड़ी रहती है। मेरे प्रिय कवि फरहत एहसास की पंक्तियां इसे सुंदर ढंग से कहती हैं:
देखा, सुना, छुआ, चखा—ताज़ा है अब भी जिस्म में,
जितना पढ़ा-लिखा था मैं, सारा खराब हो गया।”*

सवाल 4: पिछले कुछ दशकों में कवि सम्मेलनों और मुशायरों में कमी आई है। इसका युवा कवियों पर क्या असर पड़ा है?

उत्तर
इससे पीढ़ियों के बीच संवाद और मार्गदर्शन में कमी आई है। हालांकि, इससे युवा कवियों को नए मंच तलाशने की प्रेरणा भी मिली है और नए साहित्यिक समुदाय उभरे हैं।

प्रश्न 5: ओपन माइक, स्लैम पोएट्री जैसे नए मंचों को आप कैसे देखते हैं?

उत्तर यह बदलाव सकारात्मक है। इन मंचों ने कविता को अधिक लोकतांत्रिक बनाया है और प्रयोग की संभावनाएं बढ़ाई हैं। चुनौती यह है कि तात्कालिक प्रभाव और गहराई के बीच संतुलन बना रहे।

 

सवाल 6: क्या उर्दू भाषा को समर्पित और अधिक महोत्सव होने चाहिए?

उत्तर:
बिल्कुल। ऐसे आयोजनों से भाषा की परंपरा, आधुनिक स्वरूप और नई पीढ़ी से जुड़ाव मजबूत होता है।

 

सवाल  7: लेखन एकांत का कार्य है और मंचीय प्रस्तुति सामूहिक अनुभव। आपको कौन सा अधिक प्रिय है?

उत्तर:
दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। लेखन आत्ममंथन का अवसर देता है, जबकि प्रस्तुति कविता को श्रोता से जोड़ती है।


सवाल  8: आपके प्रिय उर्दू कवि कौन हैं?

उत्तर:
शास्त्रीय कवियों में मीर, ग़ालिब, सौदा, दाग़ और फ़िराक़ मुझे बेहद प्रिय हैं। समकालीन कवियों में फरहत एहसास, ज़फ़र इक़बाल, नासिर काज़मी, मोहसिन नक़वी और अहमद मुश्ताक़ शामिल हैं।

प्रश्न 9: क्या आपको लगता है कि अधिक कविता होने से दुनिया बेहतर बन सकती है?

उत्तर
हाँ। कविता करुणा, संवेदनशीलता और नैतिक कल्पना को विकसित करती है — जो आज के समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है।