संत सीचेवाल द्वारा चुनावी घोषणापत्र को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए राज्यसभा में संशोधन विधेयक पेश

7 February, 2026, 10:30 pm

चंडीगढ़ , 07 फ़रवरी

राजनीतिक धोखाधड़ी के ख़िलाफ़ एक बड़ा कदम उठाते हुए राज्यसभा सांसद और पर्यावरणविद् संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने राज्यसभा में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 (संशोधन) विधेयक, 2025 को प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में प्रस्तुत किया है। इस विधेयक का उद्देश्य भारतीय राजनीति में चुनावी वादों को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाना है। इसे चुनावी घोषणापत्रों को कानूनी मान्यता देने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल माना जा रहा है।

संत सीचेवाल ने कहा कि यदि यह बिल पारित होता है, तो चुनाव के समय जनता से किए गए वादे केवल भाषणों और काग़ज़ों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि उन्हें पूरा करना सरकारों की कानूनी ज़िम्मेदारी बन जाएगी। उन्होंने कहा कि आज़ादी के बाद से अब तक राजनीतिक दल जनता से बड़े-बड़े वादे करते आए हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनकी कोई जवाबदेही तय नहीं होती। इसके कारण लोकतंत्र में जनता का भरोसा लगातार कमजोर होता जा रहा है।

विधेयक के अनुसार, अब प्रत्येक राजनीतिक दल या गठबंधन को अपना चुनावी घोषणापत्र चुनाव आयोग के पास अनिवार्य रूप से जमा कराना होगा। प्रत्येक वादे को अल्पकालिक, मध्यमकालिक और दीर्घकालिक श्रेणियों में विभाजित करना होगा तथा उसकी समय-सीमा, अनुमानित लागत, धन के स्रोत और अपेक्षित परिणाम स्पष्ट रूप से दर्ज करने होंगे।

सरकारों को वादों की प्रगति पर नियमित रिपोर्ट देनी होगी, जिसे एक विशेष ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से सार्वजनिक किया जाएगा। वादों की निगरानी के लिए सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र मॉनिटरिंग समिति गठित की जाएगी, जो हर वर्ष अपनी रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत करेगी।

इस बिल में सख़्त प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। वादे पूरे न करने पर पहले चेतावनी, फिर लाखों रुपये का जुर्माना, और जानबूझकर गलत जानकारी देने पर सार्वजनिक निंदा के साथ भारी आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया है।

संत सीचेवाल ने बताया कि यह विधेयक भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 2013 और 2021 के फैसलों पर आधारित है, जिनमें अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि चुनावी घोषणापत्रों के लिए एक ठोस कानूनी ढांचा बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यह कानून चुनावी घोषणापत्र को केवल एक “राजनीतिक घोषणा” से ऊपर उठाकर “जनता के साथ कानूनी अनुबंध” बनाएगा। यह विधेयक उन करोड़ों मतदाताओं की आवाज़ है जो विश्वास के साथ वोट डालते हैं, लेकिन बाद में स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते हैं।