मध्यप्रदेश में वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन को नई रफ्तार, राजस्थान से जुड़ रही नई संभावनाएं

भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार ने वन्यजीव संरक्षण को पर्यावरण संतुलन के साथ आर्थिक विकास का प्रमुख आधार बनाने की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ाए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हाल ही में हुई राज्य वन्यजीव बोर्ड की बैठक में जैव विविधता संरक्षण और वन पर्यटन को व्यापक रूप से बढ़ाने की रणनीति पर जोर दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि इन पहलों से न केवल राज्य का वन पर्यटन मजबूत होगा, बल्कि पड़ोसी राज्य राजस्थान को भी इसका लाभ मिल सकता है।
संरक्षण के साथ पर्यटन को बढ़ावा
राज्य सरकार का कहना है कि बेहतर संरक्षण उपायों के कारण कई संरक्षित क्षेत्रों में वन्यजीवों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। इसी के साथ पर्यावरण अनुकूल सफारी और इको-टूरिज्म गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों में भी वृद्धि हो रही है। जंगलों और अभयारण्यों के आसपास रहने वाले समुदायों को पर्यटन से सीधे जोड़ने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
कूनो में चीता परियोजना और अंतरराज्यीय चुनौती
कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीता पुनर्वास परियोजना मध्यप्रदेश की सबसे चर्चित पहल बन चुकी है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग के तहत इस महीने बोत्सवाना से चीतों का एक और दल लाए जाने की तैयारी है, जिससे राज्य वैश्विक स्तर पर बड़े मांसाहारी वन्यजीव संरक्षण के केंद्र के रूप में उभर रहा है।
हालांकि संरक्षण की सफलता के साथ नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। केपी-2 नामक एक चीता कई बार कूनो से निकलकर राजस्थान के बारां जिले तक पहुंच चुका है। इसके बाद दोनों राज्यों के वन विभागों ने निगरानी और स्थानीय समुदायों को सतर्क करने की व्यवस्था मजबूत की है। विशेषज्ञ अब राजस्थान–मध्यप्रदेश सीमा पर सुरक्षित ‘चीता कॉरिडोर’ विकसित करने की संभावना पर भी विचार कर रहे हैं, जिससे वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित हो सके।
चुनौतियां भी कम नहीं
वन्यजीव संरक्षण के बीच हाल ही में नौरादेही अभयारण्य में पुनर्वास कार्यक्रम के तहत छोड़े गए एक युवा बाघ की मौत ने चिंताएं भी बढ़ाई हैं। प्रारंभिक स्तर पर इसे प्राकृतिक आवास, क्षेत्रीय संघर्ष या अन्य पारिस्थितिक कारणों से जोड़कर देखा जा रहा है। वन विभाग ने विस्तृत जांच शुरू कर दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी घटनाएं बताती हैं कि वैज्ञानिक निगरानी, पशु चिकित्सा सहायता और स्थानीय समुदाय की भागीदारी को और मजबूत करना जरूरी है।
पर्यटन और संरक्षण की व्यापक योजनाएं
राज्य में नए वन्यजीव पर्यटन केंद्र विकसित किए जा रहे हैं, वहीं इको-टूरिज्म और संरक्षण शिक्षा को बढ़ावा देने की योजनाएं भी लागू की जा रही हैं। संरक्षित क्षेत्रों में सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध जैसे कदम पर्यावरणीय प्रभाव कम करने और टिकाऊ पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उठाए गए हैं।
राजस्थान के साथ बढ़ती संभावनाएं
इधर राजस्थान सरकार भी पर्यटन बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर निवेश कर रही है। लगभग 975 करोड़ रुपये की योजनाओं के तहत जनजातीय पर्यटन सर्किट, हवेली संरक्षण और एयरस्ट्रिप विकास जैसे प्रोजेक्ट आगे बढ़ाए जा रहे हैं। वन्यजीवों की अंतरराज्यीय आवाजाही और पर्यटन के बढ़ते दायरे को देखते हुए विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों राज्य मिलकर एक संयुक्त इको-टूरिज्म और संरक्षण कॉरिडोर विकसित कर सकते हैं, जिससे जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ होगा।
मध्यप्रदेश की नई वन्यजीव और पर्यटन नीति संरक्षण तथा विकास के संतुलन की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। हालांकि हालिया चुनौतियां यह भी संकेत देती हैं कि वन्यजीव प्रबंधन केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं, बल्कि दीर्घकालिक वैज्ञानिक योजना और राज्यों के बीच समन्वय पर भी निर्भर करता है। यदि मध्यप्रदेश और राजस्थान इस दिशा में साझा रणनीति अपनाते हैं, तो यह मॉडल देश में इको-टूरिज्म और वन्यजीव संरक्षण का नया उदाहरण बन सकता है।




