विपक्ष ने महिलाओं के अधिकारों के रास्ते में रोड़े अटकाने का काम किया : मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी  

19 April, 2026, 11:31 pm


 
नई दिल्ली​ , 19 अप्रैल - हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि हाल ही में संसद में विपक्ष ने "नारी शक्ति वंदन अधिनियम" बिल को पास नहीं होने दिया और ऐसा करके सभी विपक्षी पार्टियों ने महिलाओं के अधिकारों के रास्ते में रोड़े अटकाने का काम किया है। अभी तक कांग्रेस ने महिलाओं को आरक्षण दिलाने के नाम पर केवल दिखावा किया है।
 
मुख्यमंत्री रविवार को रोहतक में प्रेस कॉन्फ्रेंस को सम्बोधित कर रहे थे। इस अवसर पर पश्चिम दिल्ली से सांसद कमलजीत सहरावत , भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष श्री मोहन लाल कौशिक समेत अन्य गणमान्य नेता उपस्थित थे।
 
श्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि  गत 16 व 17 अप्रैल को देश की सर्वोच्च पंचायत में विपक्ष ने  "नारी शक्ति वंदन अधिनियम" बिल का विरोध करके हमारी बहन-बेटियों के हक पर डाका डाला है। लोकतंत्र के मंदिर, संसद में जो कुछ भी हुआ, वह न केवल अलोकतांत्रिक था, बल्कि हमारे देश की आधी आबादी के भविष्य पर एक बड़ा प्रहार था। इस प्रकरण ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टी.एम. सी. और डी.एम.के. जैसे विपक्षी दलों का असली चेहरा देश के सामने उजागर कर दिया है।
 
उन्होंने आरोप लगाया कि इन दलों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जब बात महिलाओं को अधिकार देने की आती है, तो उनका असली चरित्र महिला-विरोधी और सत्ता का लोभी हो जाता है। यह महिलाओं को उनका संवैधानिक अधिकार दिलाने का ऐतिहासिक अवसर था, लेकिन विपक्ष ने इस अवसर को भी अपनी संकीर्ण राजनीति की भेंट चढ़ा दिया।
 
मुख्यमंत्री ने कहा कि गत 16 अप्रैल 2026 को केंद्र सरकार ने लोकसभा में तीन क्रांतिकारी विधेयक पेश किए थे। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक । इन विधेयकों को लाने के पीछे केंद्र सरकार का  संकल्प बहुत स्पष्ट था। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के अनुसार, महिला आरक्षण 2026 के बाद होने वाली जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होना था। केन्द्र सरकार जानती थी कि यदि हम जनगणना और लंबी परिसीमन प्रक्रिया का इंतजार करते, तो हमारी बहनों को 2029 के आम चुनाव में भी 33 प्रतिशत आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता। इसीलिए,  प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी  ने यह साहसिक निर्णय लिया कि इस आरक्षण को जनगणना की शर्त से अलग किया जाए, ताकि वर्ष 2029 के आम चुनावों में ही हमारी महिला शक्ति संसद में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा सके।
 
उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि महिलाओं की भागीदारी कोई दया नहीं, उनका अधिकार है। लेकिन कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने एक बार फिर महिलाओं के अधिकारों के रास्ते में रोड़े अटकाने का काम किया है। यह देश की आधी आबादी के साथ विश्वासघात था।
 
श्री नायब सिंह सैनी ने सवाल किया कि आखिर विपक्ष महिलाओं के आरक्षण से इतना डर क्यों रहा है? उत्तर स्पष्ट है कि ये दल जानते हैं कि जिस दिन देश की महिलाओं को उनका पूरा राजनीतिक अधिकार मिल गया, उसी दिन इनकी परिवारवाद की राजनीति खत्म हो जाएगी। महिलाओं के सशक्तिकरण से सबसे बड़ा खतरा उन दलों को है, जिन्होंने दशकों तक महिलाओं को केवल वोट बैंक समझा, लेकिन नेतृत्व का अधिकार नहीं दिया।
 
उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने वर्षों तक महिला आरक्षण के नाम पर केवल दिखावा किया। समितियां बनाई, बहाने बनाए, लेकिन कभी महिलाओं को उनका अधिकार नहीं दिया। दूसरी ओर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी  ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम लाकर महिलाओं को सम्मान दिया। लेकिन जब उसे लागू करने की घड़ी आई, तब विपक्ष का असली महिला विरोधी चेहरा सामने आ गया।
 
उन्होंने कहा कि विपक्ष ने परिसीमन के नाम पर झूठ और भ्रम फैलाया,  कहा गया कि इससे कुछ राज्यों को नुकसान होगा। लेकिन गृह मंत्री श्री अमित शाह ने संसद में तथ्यों के साथ स्पष्ट कर दिया कि किसी भी राज्य का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा। सीटों में समान वृद्धि होगी, सभी राज्यों का संतुलन बना रहेगा। फिर भी विपक्षी  नेता लगातार झूठ बोलते रहे, क्योंकि उनका उद्देश्य महिलाओं को अधिकार देना नहीं, बल्कि स्वार्थ की राजनीति करना है।
 
मुख्यमंत्री ने विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि वर्ष 1971 में जब हमारी आबादी 54 करोड़ थी, तब लोकसभा की सीटें 550 तय की गई थीं। आज हम 140 करोड़ हैं। इसलिए, यह आवश्यक है कि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 की जाए ताकि हर नागरिक का सही प्रतिनिधित्व हो सके। इसको लेकर विपक्ष ने एक और झूठ फैलाया कि इससे दक्षिण भारत के राज्यों को नुकसान होगा।
 
उन्होंने स्पष्ट करते हुए बताया कि केंद्र सरकार का मॉडल सभी राज्यों में समान रूप से 50 प्रतिशत सीटों की वृद्धि का था। उदाहरण के तौर पर, दक्षिण भारतीय राज्यों की वर्तमान हिस्सेदारी 23.76 प्रतिशत है, जो इस नए मॉडल में बढ़कर 23. 87 प्रतिशत हो जाती। तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 और कर्नाटक की 28 से बढ़कर 42 होने वाली थीं। यानी किसी भी राज्य का हक छीनने का नहीं, बल्कि सबका हक बढ़ाने का यह प्रस्ताव था।
 
लेकिन कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टी.एम.सी. और डी.एम.के. ने इन विधेयकों का विरोध करके यह सिद्ध कर दिया है कि वे केवल महिलाओं के कल्याण का ढोंग करते हैं। समाजवादी पार्टी ने धर्म आधारित आरक्षण की असंवैधानिक मांग उठाकर केवल मामले को भटकाने का काम किया है, जबकि हमारा संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता। विपक्ष जानता है कि अगर बहस असली मुद्दे पर हुई, तो देश की महिलाएं पूछेंगी कि इतने वर्षों तक उन्हें अधिकार क्यों नहीं दिया गया, इसलिए मुद्दे भटकाए जा रहे हैं।
 
मुख्यमंत्री ने कांग्रेस पर दोगली नीति अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेसी नेता जो शाहबानो मामले में महिलाओं के खिलाफ खड़े थे और जिन्होंने दशकों तक महिला आरक्षण को तकनीकी बहानों और फाइलों में दबाकर रखा, वे आज भी वही साजिश दोहरा रहे हैं।