महाराष्ट्र सदन में 'प्रशासन में गीता की भूमिका' विषय पर विशेष व्याख्यान संपन्न

27 February, 2026, 10:53 pm

 

नई दिल्ली, 27 फरवरी : भगवद्गीता केवल एक आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन की हर समस्या का व्यावहारिक समाधान खोजने वाला शास्त्र है। प्रशासन और लोकसेवा करते समय यदि गीता के कर्मयोग के सिद्धांत को अपनाया जाए, तो कार्यक्षमता और अधिक बढ़ती है। यह प्रतिपादन 'जियो गीता' के प्रणेता महामंडलेश्वर गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने किया। नई दिल्ली के कॉपरनिकस मार्ग स्थित महाराष्ट्र सदन के प्रांगण में 'प्रशासन में श्रीमद्भगवद्गीता की भूमिका' विषय पर आयोजित विशेष प्रबोधन कार्यक्रम में वे बोल रहे थे। महाराष्ट्र सदन की निवासी आयुक्त  तथा सचिव आर. विमला की पहल पर इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।

भगवद्गीता विचारों के प्रवाह को सकारात्मक और सृजनशील बनाती है,
अपनी ओजस्वी शैली में मार्गदर्शन करते हुए स्वामी जी ने कहा कि मानव जीवन की असली समस्या परिस्थिति नहीं बल्कि मनुष्य के विचार हैं। जिस प्रकार गाड़ी की दिशा बदलने के लिए उसका स्टयरिंग घुमाना पड़ता है, उसी तरह जीवन की गाड़ी को सही मार्ग पर लाने के लिए मन का स्टयरिंग घुमाना आवश्यक है। भगवद्गीता विचारों के प्रवाह को सकारात्मक और सृजनशील बनाती है, जिससे मनुष्य की क्षमताओं का विकास होता है। आज के प्रतिस्पर्धी युग में बच्चों पर परीक्षा के परिणामों का अत्यधिक दबाव होने पर उन्होंने चिंता व्यक्त की। गीता का 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' मंत्र यही सिखाता है कि फल की चिंता किए बिना जब हम अपना पूरा ध्यान कर्तव्य पर केंद्रित करते हैं, तो परिणाम अपने आप ही उत्तम आता है। प्रशासनिक कार्यों में तनाव और नैतिक दुविधाओं पर चर्चा करते हुए स्वामी जी ने उल्लेख किया कि तनावमुक्त कार्य-संस्कृति के लिए गीता का ज्ञान एक प्रकाश स्तंभ की तरह है। जब कोई प्रशासक निष्पक्ष रूप से और केवल जनहित के लिए कर्तव्य निभाता है, तभी सही अर्थों में लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण होता है। गीता केवल एक आध्यात्मिक पुस्तक नहीं बल्कि एक उत्तम प्रबंधन शास्त्र (Management Science) है।

महाराष्ट्र में  संत परंपरा का गौरव
इस अवसर पर गुरुग्राम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. मार्कंडेय आहूजा ने महाराष्ट्र की संत परंपरा का गौरव गान किया। महाराष्ट्र को गीता के दर्शन की वास्तविक प्रयोगशाला बताते हुए उन्होंने कहा कि संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव और समर्थ रामदास ने गीता के उपदेश को केवल शब्दों में नहीं बांधा, बल्कि उसे आम जनता और वंचितों तक पहुंचाया। लोकमान्य तिलक ने 'गीतारहस्य' लिखकर कर्मयोग का मार्ग दिखाया, तो विनोबा भावे ने 'भूदान' आंदोलन के माध्यम से प्रत्यक्ष कर्म द्वारा गीता को जीकर दिखाया। यदि हमारे प्रशासन में यह सेवा भाव आता है, तभी वास्तव में समाज का हित संभव होगा।

वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सुमेधा कटारिया और आर. राजन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रशासनिक सेवा की चुनौतियों और गीता की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रशासनिक निर्णयों की प्रक्रिया और मानसिक संघर्ष के समय भगवद्गीता एक सच्चे मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है।

'शांति मंत्र' का  प्रबोधन
कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए निवासी आयुक्त आर. विमला ने उल्लेख किया कि भागदौड़ भरे प्रशासनिक जीवन में मानसिक शांति और कार्य के प्रति समर्पण निर्माण करने में आध्यात्मिक विचारों से बड़ी मदद मिलती है। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों को गीता की प्रतियां वितरित की गईं और 'शांति मंत्र' के साथ इस प्रबोधन कार्यक्रम का समापन हुआ।