इंडिया हैबिटेट सेंटर में दीप नारायण पाल की प्रदर्शनी

नई दिल्ली के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र इंडिया हैबिटेट सेंटर में इन दिनों कोलकाता के कलाकार दीप नारायण पाल की कला प्रदर्शनी दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर रही है। उनकी कलाकृतियां भारतीय मिथकों, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का सशक्त संगम प्रस्तुत करती हैं।
दीप नारायण पाल की विशेषता उनकी मिथोलॉजिकल आर्ट है। उनकी पेंटिंग्स में राधा-कृष्ण और मां दुर्गा जैसे विषयों को आधुनिक कलात्मक शैली में उकेरा गया है। ये सभी रचनाएं एक्रेलिक ऑन कैनवस माध्यम में तैयार की गई हैं, जिनमें रंगों की गहराई और भावनात्मक अभिव्यक्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
उनकी कला केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना भी निहित है। दीप नारायण पाल अपने कार्यों के माध्यम से वाराणसी की बदलती तस्वीर को सामने लाते हैं। उनके अनुसार, बनारस भारत की प्राचीन सभ्यता का जीवंत प्रतीक है और उसकी विरासत हमारे लिए अमूल्य धरोहर है।
विशेष रूप से मणिकर्णिका घाट के पुनर्निर्माण को लेकर वे चिंता व्यक्त करते हैं। उनका मानना है कि पुराने घाटों और गलियों का स्वरूप बदलना हमारी सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित कर सकता है।
उनकी एक प्रमुख पेंटिंग में भगवान शिव और मां पार्वती को एक नाव में पूरे बनारस को उठाए हुए दर्शाया गया है। यह प्रतीकात्मक चित्र इस विचार को व्यक्त करता है कि बनारस की आत्मा और उसकी रक्षा स्वयं भगवान शिव और मां पार्वती के हाथों में है, चाहे समय कितना भी बदल जाए।
दीप नारायण पाल का कहना है कि बनारस की पुरानी गलियां, मंदिर और घाट ही उसकी वास्तविक पहचान हैं, जिन्हें देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। लेकिन तेजी से हो रहे आधुनिकीकरण के बीच “नया बनारस” बसाने की प्रक्रिया उन्हें असहज करती है, क्योंकि इससे परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन प्रभावित होता नजर आता है।
दीप नारायण पाल ने गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट, चंडीगढ़ से कला की शिक्षा प्राप्त की है। उनकी प्रदर्शनी जहांगीर आर्ट गैलरी, ललित कला अकादमी, दुबई और कनाडा जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी लग चुकी है।
यह प्रदर्शनी केवल कला का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक विचार-विमर्श भी है—जो यह सवाल उठाती है कि विकास की तेज रफ्तार में क्या हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं।


YXG8.jpeg)



