डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर को दर्शकों तक पहुंचना होगा

नई दिल्ली, 7 मई, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की स्वायत्त संस्था इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के सहयोग से आयोजित 15वें दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (DIFF) के तीसरे दिन “डॉक्यूमेंट्री की दृष्टि : सत्य, प्रयोग या दृष्टिकोण” विषय पर एक विशेष पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। इस संवाद में डॉक्यूमेंट्री सिनेमा की प्रकृति, उसकी वैचारिक भूमिका, निष्पक्षता, समस्याएं तथा समकालीन मीडिया परिदृश्य में उसकी प्रासंगिकता पर गंभीर विमर्श हुआ।
कार्यक्रम में लेखक एवं फिल्म निर्माता अभय मिश्रा और फिल्म निर्माता राजेश अमरोही ने अपने विचार साझा किए। चर्चा का संचालन तृप्ति श्रीवास्तव ने किया। वक्ताओं ने इस प्रश्न पर विस्तार से चर्चा की कि क्या डॉक्यूमेंट्री सिनेमा पूर्णतः निष्पक्ष हो सकता है अथवा वह किसी विशेष दृष्टिकोण और नैरेटिव निर्माण का माध्यम बन जाता है। विशेषज्ञों ने कहा कि डॉक्यूमेंट्री केवल तथ्यों का संकलन नहीं, बल्कि संवेदनशील प्रस्तुति और दृष्टिकोण का भी माध्यम है, इसलिए फिल्मकार की वैचारिक स्थिति और प्रस्तुति शैली उसकी संरचना को प्रभावित करती है।
चर्चा के दौरान रिपोर्टिंग और डॉक्यूमेंट्री कहानी कहने के अंतर पर भी विचार व्यक्त किए गए। वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारिता तात्कालिक सूचना देने का माध्यम है, जबकि डॉक्यूमेंट्री किसी विषय के सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय पक्षों को गहराई से समझने और प्रस्तुत करने का प्रयास करती है। पैनल में वैश्विक और भारतीय डॉक्यूमेंट्री सिनेमा के विभिन्न उदाहरणों का उल्लेख करते हुए यह भी बताया गया कि आज के समय में डॉक्यूमेंट्री केवल वैकल्पिक सिनेमा नहीं रह गई है, बल्कि सामाजिक विमर्श और जनमत निर्माण का प्रभावी माध्यम बन चुकी है।
राजेश अमरोही ने कहा कि डॉक्यूमेंट्री के दर्शक हैं, लेकिन हमें डॉक्यूमेंट्री देखने वाले दर्शकों तक पहुंचना होगा। उन्होंने कहा कि आज की परिस्थितियों में कुएं को प्यासे के पास जाना पड़ेगा। उन्होंने कहा, हमें डॉक्यूमेंट्री के दर्शक वर्ग को तैयार करना पड़ेगा। वहीं अभय मिश्रा ने कहा कि कैमरा झूठ नहीं बोलता, लेकिन कैमरे के पीछे खड़ा व्यक्ति झूठ बोल सकता है, इसकी पूरी संभावना होती है। डॉक्यूमेंट्री सच दिखाती है, लेकिन वो बनाने वाले का अपना सच होता है। वक्ताओं ने डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के लिए फंड की समस्या होती है, उसका प्रोमोशन भी नहीं हो पाता। लेकिन यह भी ध्यान देने लायक बात है डॉक्यूमेंट्री का एक सीमित दर्शक वर्ग होता है, उसकी तुलना सिनेमा से नहीं की जा सकती। चर्चा का पूरी दक्षता से संचालन करते हुए तृप्ति श्रीवास्तव ने कहा कि कई डॉक्यूमेंट्री फिल्में ऐसी भी आती हैं, जो पॉलिटिकल प्रोपेगेंडा के उद्देश्य से बनाई जाती हैं।
कार्यक्रम में फिल्म, मीडिया और संस्कृति से जुड़े विद्यार्थियों, शोधार्थियों, फिल्मकारों तथा कला प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। उपस्थित श्रोताओं ने विशेषज्ञों से प्रश्न पूछकर चर्चा को और समृद्ध बनाया। आईजीएनसीए द्वारा आयोजित यह संवाद समकालीन डॉक्यूमेंट्री सिनेमा की दिशा और उसके सामाजिक प्रभाव को समझने की दृष्टि से अत्यंत सार्थक और विचारोत्तेजक सिद्ध हुआ।

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