चंडीगढ़ में लॉन्च हुई जे.आर. कुंदल की किताब, भारतीय समाज में गिरते नैतिक मूल्यों पर गहन विमर्श

6 March, 2026, 6:56 pm

 

चंडीगढ़, 6 मार्च। पूर्व नौकरशाह और लेखक जे.आर. कुंदल की नई पुस्तक “Musings on the Fragile Morals of Indian Society” का शुक्रवार को चंडीगढ़ स्थित थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन (IDC) में विमोचन किया गया। इस मौके पर शिक्षाविद, पूर्व नौकरशाह, शोधकर्ता और बड़ी संख्या में छात्र मौजूद रहे।

यह पुस्तक उनकी पहले प्रकाशित पुस्तक “Tunnel With a Dead-End! The Caste Cesspool and the Indian Society” के बाद आई है। नई किताब में कुंदल ने समकालीन भारतीय समाज में नैतिक मूल्यों के क्षरण, राजनीतिक विचारधारा की शून्यता, संस्थागत कमजोरियों और लोकतंत्र के सामने खड़ी चुनौतियों का विश्लेषण किया है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जे.आर. कुंदल ने कहा कि इस पुस्तक का उद्देश्य लोगों को अपने आसपास हो रही घटनाओं पर ठहरकर सोचने के लिए प्रेरित करना है। उन्होंने कहा कि आधुनिक समाज में मौजूद विरोधाभासों को देखकर उन्हें यह पुस्तक लिखने की प्रेरणा मिली। कुंदल ने कहा, “लोकतंत्र को बनाए रखना हमेशा महंगा होता है, इसलिए समाज में मौजूद खामियों को पहचानना और उन पर चर्चा करना जरूरी है।”

IDC के चेयरमैन डॉ. प्रमोद कुमार ने कहा कि लेखक ने अपने अकादमिक अध्ययन और जीवन के अनुभवों को मिलाकर समकालीन भारतीय समाज की नैतिक कमजोरी को समझाने की कोशिश की है। उन्होंने बताया कि यह पुस्तक कोई जटिल दार्शनिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि व्यावहारिक अनुभवों और स्थापित विद्वानों के विचारों से निकली एक संवेदनशील व्याख्या है।

पंजाब के पूर्व मुख्य सचिव राजन कश्यप ने कहा कि लेखक पाठकों को निष्कर्ष थोपने के बजाय विश्लेषण के जरिए सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने कहा कि किताब समाज के सामने खड़े नैतिक पतन के कारणों को समझने का अवसर देती है और यह दिखाती है कि कई संस्थाएं लोगों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी हैं।

पंजाब के पूर्व मुख्य सचिव सर्वेश कौशल ने कहा कि यह पुस्तक पाठकों को भारत की सांस्कृतिक यात्रा से परिचित कराती है और याद दिलाती है कि सभ्यताओं का पतन बाहरी आक्रमणों से नहीं बल्कि अंदरूनी सड़न से होता है।

पंजाब विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के डॉ. लल्लन सिंह बघेल ने कहा कि भारतीय बौद्धिक परंपराओं और आंकड़ों के उपयोग के कारण यह पुस्तक आम पाठकों के लिए भी सहज बन जाती है। उन्होंने कहा कि लेखक उपदेश देने वाले की तरह नहीं बल्कि समाज के एक साक्षी के रूप में सामने आते हैं।

चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के लिबरल आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटीज क्लस्टर के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर प्रो. अनुराग वर्मा ने कहा कि यह पुस्तक समाज की कई परतों को खोलती है और बताती है कि आज के सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार, धमकियों और असभ्य भाषा का सामान्य होना किस तरह चिंता का विषय बन गया है।

IDC के प्रोफेसर एमेरिटस और राजनीतिक वैज्ञानिक प्रो. रोंकी राम ने कहा कि इस पुस्तक की संरचना उन्हें सबसे अधिक आकर्षक लगी। उनके अनुसार लेखक ने सभ्यताओं के इतिहास और वर्तमान समय के बीच तुलना करते हुए समाज के कई महत्वपूर्ण सवालों की पड़ताल की है।