सर्वाइकल कैंसर रोकथाम दिवस 2026: जागरूकता से जनआंदोलन तक
नई दिल्ली। 27 मई 2026 को राजधानी दिल्ली स्थित India Habitat Centre के जुनिपर हॉल में आयोजित “सर्वाइकल कैंसर प्रिवेंशन डे 2026” केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य, जागरूकता और रोकथाम को लेकर चल रहे एक व्यापक जनआंदोलन का प्रतीक बनकर उभरा। इस अवसर पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं, सामाजिक संगठनों, जमीनी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और विभिन्न संस्थानों ने मिलकर यह संकल्प दोहराया कि सर्वाइकल कैंसर जैसी रोकी जा सकने वाली बीमारी से अब किसी महिला की जान नहीं जानी चाहिए।
सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम को लेकर जागरूकता बढ़ी
कार्यक्रम का आयोजन ऐसे समय हुआ जब भारत में सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम को लेकर जागरूकता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन चुनौतियां अब भी गंभीर हैं। वर्षों तक यह बीमारी सामाजिक झिझक, जानकारी की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच के कारण महिलाओं के लिए एक मौन खतरा बनी रही। स्क्रीनिंग, एचपीवी वैक्सीनेशन और शुरुआती जांच जैसे विषय ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में चर्चा का हिस्सा तक नहीं बन पाए थे।
CAPED Trust की भूमिका महत्वपूर्ण
इसी पृष्ठभूमि में CAPED Trust ने पिछले वर्षों में जागरूकता और शुरुआती जांच के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संस्था के अनुसार अब तक देशभर में 8.9 करोड़ से अधिक लोगों तक जागरूकता अभियान पहुंचाए जा चुके हैं, जबकि 84 हजार से अधिक महिलाओं की सर्वाइकल कैंसर स्क्रीनिंग की गई है। इन अभियानों के माध्यम से हजारों संदिग्ध मामलों की समय रहते पहचान कर उन्हें उपचार के लिए रेफर किया गया।
कार्यक्रम में यह बात बार-बार सामने आई कि सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ लड़ाई केवल अस्पतालों या डॉक्टरों की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें आशा कार्यकर्ताओं, सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेवकों, शिक्षकों, परिवारों और स्थानीय नेतृत्व की समान भूमिका है। गांव-गांव जाकर महिलाओं को जांच के लिए प्रेरित करने वाली आशा कार्यकर्ता इस अभियान की असली ताकत बनकर उभरी हैं।
कार्यक्रम में Indian Institute of Technology Delhi और All India Institute of Medical Sciences जैसे संस्थानों की भागीदारी ने यह संकेत दिया कि अब कैंसर रोकथाम को केवल चिकित्सा विषय नहीं बल्कि तकनीक, व्यवहार विज्ञान और सामुदायिक सहभागिता के साथ जोड़कर देखा जा रहा है।
आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर धीर ने कहा कि तकनीक तभी सार्थक है जब उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि भारत में कैंसर रोकथाम का भविष्य केवल वैज्ञानिक प्रगति पर नहीं बल्कि इन सुविधाओं को हर महिला तक सुलभ और किफायती बनाने पर निर्भर करेगा।
कार्यक्रम की शुरुआत “व्हेन होप फाइंड्स रिदम” शीर्षक से भरतनाट्यम प्रस्तुति से हुई, जिसे गायत्री शर्मा और भद्रा सिन्हा ने प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति ने बीमारी, संघर्ष, उम्मीद और सामाजिक जागरूकता को भावनात्मक रूप से मंच पर जीवंत कर दिया।
पूर्व आईएएस अधिकारी Arti Ahuja ने कहा कि कैंसर रोकथाम को केवल स्वास्थ्य क्षेत्र का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। इसे प्रशासनिक प्राथमिकता और सामाजिक जिम्मेदारी दोनों के रूप में देखना होगा। वहीं जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ Dr. Raj Shankar Ghosh ने समुदाय आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत पर बल दिया।
Shashi Prakash Jha ने कहा कि केवल स्वास्थ्य ढांचा खड़ा कर देना काफी नहीं है। समुदायों में भरोसा पैदा करना, महिलाओं तक सही जानकारी पहुंचाना और जांच से लेकर इलाज तक निरंतर सहायता उपलब्ध कराना उतना ही आवश्यक है।
कार्यक्रम में झारखंड और उत्तराखंड जैसे राज्यों में चल रहे प्रयासों का भी उल्लेख किया गया, जहां स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करने, प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग के माध्यम से महिलाओं तक सर्वाइकल कैंसर रोकथाम सेवाएं पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
एक विशेष सत्र “स्टोरीज फ्रॉम द सॉइल: मेन चैंपियनिंग चेंज इन कम्युनिटीज” में इस बात पर चर्चा हुई कि पुरुषों की भागीदारी भी महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी सामाजिक संकोच को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। स्थानीय समुदायों में पुरुषों द्वारा जागरूकता फैलाने से परिवारों में स्क्रीनिंग और वैक्सीनेशन को लेकर सकारात्मक माहौल बन रहा है।
कार्यक्रम के अंत में जमीनी स्तर पर काम कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों, स्वयंसेवकों और सामुदायिक कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया गया। आयोजकों ने माना कि यही लोग भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे की वास्तविक ताकत हैं।
सर्वाइकल कैंसर प्रिवेंशन डे 2026 का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि यह बीमारी अब केवल चिकित्सा चर्चा का विषय नहीं रही। यह एक राष्ट्रीय सामाजिक जिम्मेदारी बनती जा रही है, जिसमें सरकार, संस्थान, डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी, परिवार और समाज सभी की साझी भूमिका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर स्क्रीनिंग, एचपीवी वैक्सीनेशन और जागरूकता के माध्यम से सर्वाइकल कैंसर के अधिकांश मामलों को रोका जा सकता है। लेकिन इसके लिए जागरूकता के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं तक समान और सुलभ पहुंच सुनिश्चित करना सबसे बड़ी आवश्यकता है।





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