राष्ट्र प्रथम की वैचारिक यात्रा

लेखक
डॉ. अर्चना गुप्ता
प्रदेश अध्यक्षा, भाजपा हरियाणा
लोकतंत्र केवल सरकारें बनाने की व्यवस्था नहीं है; लोकतंत्र विचारों की प्रतिस्पर्धा, सिद्धांतों की दृढ़ता और राष्ट्रहित के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता का नाम है। जब राजनीति विचारविहीन हो जाती है, तब वह केवल सत्ता का गणित बनकर रह जाती है। लेकिन जब राजनीति राष्ट्र की आत्मा, उसकी संस्कृति और उसके भविष्य के प्रति उत्तरदायी होती है, तभी वह इतिहास रचती है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने स्वतंत्र भारत की राजनीति को यही वैचारिक दिशा प्रदान की।
स्वतंत्रता के पश्चात भारत एक नए लोकतांत्रिक युग में प्रवेश कर चुका था। देश के सामने संविधान निर्माण, आर्थिक पुनर्निर्माण, विस्थापितों का पुनर्वास, राष्ट्रीय एकीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने जैसी अनेक चुनौतियाँ थीं। ऐसे समय में यह आवश्यक था कि लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित न रहे, बल्कि राष्ट्र के भविष्य पर गंभीर वैचारिक संवाद का भी माध्यम बने। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने इस आवश्यकता को समय से बहुत पहले पहचान लिया था।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का विश्वास था कि लोकतंत्र तभी सशक्त बनता है जब उसमें स्वस्थ वैचारिक विकल्प उपलब्ध हों। उनके लिए विपक्ष केवल सरकार की आलोचना करने वाला समूह नहीं था, बल्कि राष्ट्रहित में रचनात्मक सुझाव देने वाला उत्तरदायी मंच था। वे मानते थे कि राष्ट्रीय जीवन में विचारों की विविधता लोकतंत्र को कमजोर नहीं, बल्कि और अधिक परिपक्व बनाती है।
इसी राष्ट्रीय दृष्टि के साथ 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। यह केवल एक नए राजनीतिक दल का गठन नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रवादी विचारधारा को संगठित स्वर देने का ऐतिहासिक प्रयास था। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने स्पष्ट किया कि राजनीति का अंतिम उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि राष्ट्र की सेवा, समाज का उत्थान और भारत की सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा होना चाहिए।
भारतीय जनसंघ की स्थापना ऐसे समय में हुई जब भारत अपने लोकतांत्रिक चरित्र को आकार दे रहा था। डॉ. मुखर्जी जी ने संगठन को केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे ऐसे कार्यकर्ताओं का संगठन बनाने का प्रयास किया जो राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखें, सार्वजनिक जीवन में शुचिता बनाए रखें और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहें। उनके लिए संगठन की सबसे बड़ी शक्ति उसका विचार और उसके कार्यकर्ताओं का चरित्र था।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का मानना था कि यदि राजनीति समाज से कट जाए, तो वह केवल सत्ता का माध्यम बन जाती है; लेकिन यदि राजनीति समाज की आकांक्षाओं से जुड़ जाए, तो वह राष्ट्र निर्माण का सबसे प्रभावी साधन बन सकती है। यही कारण था कि उन्होंने जनसंघ की वैचारिक यात्रा को भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय एकता, सुशासन, सामाजिक समरसता और आत्मनिर्भरता जैसे मूलभूत सिद्धांतों से जोड़ा।
आज भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ विचारों को अभिव्यक्ति का अवसर मिला और वैचारिक लोकतंत्र निरंतर विकसित हुआ। इस विकास यात्रा में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का योगदान केवल एक राजनीतिक संगठन की स्थापना तक सीमित नहीं है। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को यह विश्वास दिया कि राष्ट्रहित पर आधारित विचार समय के साथ और अधिक सशक्त होते हैं।
आज जब भारत “विकसित भारत” के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, तब यह स्मरण करना आवश्यक है कि मजबूत लोकतंत्र केवल आर्थिक उपलब्धियों से नहीं बनता। वह मजबूत विचारों, उत्तरदायी नेतृत्व, राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाली राजनीति और समाज के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं से बनता है। यही वह वैचारिक विरासत है जिसे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना के माध्यम से देश को दिया।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने एक बार कहा था कि “देश दल से बड़ा है।” यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि उनके संपूर्ण सार्वजनिक जीवन का दर्शन था। उन्होंने अपने आचरण से सिद्ध किया कि राजनीतिक दल राष्ट्र की सेवा के साधन हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र स्वयं सर्वोच्च है।
आज, उनकी 125वीं जयंती वर्ष पर उन्हें स्मरण करते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारतीय जनसंघ की स्थापना केवल इतिहास की एक घटना नहीं थी; वह भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में वैचारिक राष्ट्रवाद, सार्वजनिक जीवन की शुचिता और राष्ट्र प्रथम की राजनीति का वह प्रारंभिक अध्याय था, जिसकी प्रतिध्वनि आज भी भारत की लोकतांत्रिक चेतना में स्पष्ट सुनाई देती है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने हमें केवल एक राजनीतिक संगठन नहीं दिया; उन्होंने भारतीय राजनीति को एक नैतिक आधार, एक वैचारिक दिशा और राष्ट्र सर्वोपरि का अमर मंत्र दिया। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है और यही आने वाली पीढ़ियों के लिए उनका शाश्वत संदेश भी।












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