एवरेस्ट बेस कैंप तक ‘समावेशी ट्रैक’

3 April, 2026, 8:04 pm

 

भारत में एडवेंचर स्पोर्ट्स और सामाजिक समावेशन को जोड़ने की दिशा में एक अहम पहल के तहत टिंकेश एबिलिटी फाउंडेशन (TAF) 4 से 19 अप्रैल 2026 के बीच एवरेस्ट बेस कैंप तक देश के सबसे बड़े “समावेशी ट्रैक” का नेतृत्व करने जा रहा है। यह अभियान न सिर्फ भौतिक चुनौती है, बल्कि सामाजिक सोच में बदलाव लाने का एक प्रयास भी है।

समावेशन का नया मॉडल

इस ट्रैक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी इन्क्लूसिविटी (समावेशिता) है। इसमें दृष्टिहीन, कम दृष्टि वाले और पहली बार व्हीलचेयर उपयोग करने वाले प्रतिभागी शामिल होंगे। उनके साथ गैर-दिव्यांग प्रतिभागी भी ट्रैक करेंगे, जो “समान अवसर” और “साझा अनुभव” के सिद्धांत को मजबूत करता है।

यह मॉडल पारंपरिक ‘सपोर्ट-आधारित’ दृष्टिकोण से आगे बढ़कर
सहभागिता-आधारित समावेशन को बढ़ावा देता है—जहां दिव्यांग व्यक्ति केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि सक्रिय प्रतिभागी हैं।

नेतृत्व और प्रतीकात्मक महत्व

इस अभियान का नेतृत्व टिंकेश कौशिक कर रहे हैं, जो एक राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता और दिव्यांग सशक्तिकरण के क्षेत्र में प्रमुख नाम हैं। उनका नेतृत्व इस पहल को सिर्फ एक ट्रैकिंग इवेंट नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का रूप देता है।

2025 की सफलता से 2026 की उड़ान

इससे पहले अप्रैल 2025 में अन्नपूर्णा बेस कैंप तक सफल समावेशी ट्रैक आयोजित किया गया था। उस अभियान ने यह साबित किया कि उचित योजना, प्रशिक्षण और समर्थन के साथ दिव्यांग प्रतिभागी भी कठिन हिमालयी ट्रैक पूरे कर सकते हैं। 2026 का एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक उसी सफलता का विस्तार है।—लेकिन अधिक चुनौतीपूर्ण और प्रतीकात्मक रूप में।

एडवेंचर टूरिज्म में नई दिशा

यह पहल भारत में इन्क्लूसिव एडवेंचर टूरिज्म के लिए एक केस स्टडी बन सकती है। अब तक एडवेंचर टूरिज्म मुख्यतः शारीरिक रूप से सक्षम लोगों तक सीमित रहा है, लेकिन TAF का यह प्रयास इस धारणा को चुनौती देता है।

इसका प्रभाव तीन स्तरों पर देखा जा सकता है।
पहला नीतिगत स्तर पर सरकार को समावेशी टूरिज्म के लिए दिशानिर्देश और इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने का संकेत देनाकॉर्पोरेट स्तर पर  CSR के तहत एडवेंचर और दिव्यांग सशक्तिकरण के मेल की संभावना तलाशना दिव्यांगता को “सीमा” नहीं बल्कि “विविधता” के रूप में देखने की मानसिकता

चुनौतियां और व्यावहारिक पक्ष

हालांकि यह पहल प्रेरणादायक है, लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी जुड़ी हैं: हिमालयी ट्रैकिंग रूट्स अभी पूरी तरह व्हीलचेयर-फ्रेंडली नहीं हैंऊंचाई, मौसम और स्वास्थ्य जोखिम अधिक होते हैं विशेष उपकरण, मेडिकल सपोर्ट और प्रशिक्षित गाइड्स की जरूरत इन चुनौतियों को सफलतापूर्वक संभालना ही इस अभियान की वास्तविक परीक्षा होगी।

 ‘डिसएबिलिटी’ से ‘डिफरेंट एबिलिटी’ तक

यह ट्रैक एक मजबूत संदेश देता है कि दिव्यांगता अक्षमता नहीं, बल्कि अलग क्षमता (Different Ability) है। सही समर्थन, सकारात्मक मानसिकता और समावेशी सोच के साथ हर बाधा को पार किया जा सकता है—even in extreme environments like the Himalayas.एवरेस्ट बेस कैंप तक यह समावेशी ट्रैक सिर्फ एक साहसिक यात्रा नहीं, बल्कि समाज के लिए एक आईना है—जो दिखाता है कि अगर अवसर और संरचना समान हो, तो कोई भी व्यक्ति किसी भी ऊंचाई तक पहुंच सकता है।

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