पंजाब सिर्फ अवधारणा नहीं, एक विचारधारा है: हरविंदर सिंह

चंडीगढ़, 14 अगस्त। यूनाइटेड पंजाबी ऑर्गनाइजेशन (UPO) और इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन (IDC) की ओर से चंडीगढ़ स्थित IDC परिसर में ‘सांप्रदायिक आधार पर पंजाब के विभाजन का विरोध करने वाले पंजाबी राजनीतिक नेताओं की दृष्टि और उसकी समकालीन प्रासंगिकता’ विषय पर सेमिनार आयोजित किया गया।
सेमिनार को संबोधित करते हुए UPO के संस्थापक हरविंदर सिंह ने सर छोटू राम और सर खिजर हयात खान तिवाना की राजनीतिक सोच का उल्लेख करते हुए कहा कि पंजाब महज भौगोलिक या राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक विचारधारा है।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता दिवस पंजाबियों के लिए अलग-अलग भावनाएं लेकर आता है। जहां कुछ लोगों के लिए यह उत्सव का अवसर है, वहीं दूसरों के लिए 1947 में विभाजित हुई जमीन और संस्कृति की याद इसे गंभीर और भावुक अवसर बना देती है। उन्होंने कहा कि UPO का एक प्रमुख उद्देश्य अविभाजित पंजाब की स्मृति और उसकी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखना है।
IDC के चेयरपर्सन डॉ. प्रमोद कुमार ने कहा कि भारतीय, पाकिस्तानी और प्रवासी पंजाबी अलग-अलग राजनीतिक संदर्भों में रहते हुए भी एक साझा सभ्यतागत विरासत से जुड़े हैं। इसमें पंजाबी भाषा, कृषि संस्कृति, कविता, संगीत, खान-पान, रिश्तेदारी, हास्य, प्रवास और जमीन से जुड़ाव शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि पंजाब को दो विरोधाभासी दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है। एक ओर यह एक साझा सभ्यता है, जिसकी सांस्कृतिक परंपराएं धर्म और सीमाओं से परे आज भी कायम हैं। दूसरी ओर, विभाजन ने लोगों की पहचान और जुड़ाव को दो राष्ट्र-राज्यों के बीच बांट दिया। प्रवासी पंजाब ने पंजाब को याद करने, प्रस्तुत करने और नए सिरे से परिभाषित करने का तीसरा आयाम जोड़ दिया है।
डॉ. कुमार ने कहा कि आज भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या पंजाबी अस्मिता राष्ट्रीय नागरिकता और आंतरिक विविधताओं को स्वीकार करते हुए राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर एक साझा पहचान कायम कर सकती है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. प्यारे लाल ने पंजाबी भाषा और पहचान को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि आज कई पंजाबी अपनी मातृभाषा बोलने में भी संकोच महसूस करते हैं। उन्होंने कहा, “दुर्भाग्य से कई बार लोगों को पंजाबी कहलाने में भी शर्म महसूस होती है।”**
IDC के प्रोफेसर एमेरिटस डॉ. रौंकी राम ने कहा कि सर छोटू राम और सर खिजर हयात खान तिवाना की राजनीतिक सोच आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि 1920 और 1930 के दशक में जब राजनीतिक दल पंजाब में समर्थन जुटा रहे थे, तब कई स्तरों पर सांप्रदायिक पहचान के आधार पर लामबंदी की जा रही थी। इसके विपरीत छोटू राम और खिजर हयात खान तिवाना ने धार्मिक और सांप्रदायिक पहचान से ऊपर उठकर सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की कोशिश की।
डॉ. रौंकी राम के अनुसार, दोनों नेता भारत के लिए अधिक संघीय ढांचे की भी वकालत कर रहे थे।
सेमिनार में पंजाब किसान एवं खेत मजदूर आयोग के चेयरमैन डॉ. सुखपाल सिंह सहित अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। चर्चा में पंजाब की साझा सांस्कृतिक विरासत, विभाजन की ऐतिहासिक स्मृति और वर्तमान दौर में पंजाबी पहचान की प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श किया गया।




.jpeg)
.jpg)
.png)











YXG8.jpeg)



