चंडीगढ़ में सप्त सिंधु फ्रीडम आइकन अवार्ड्स, 24 स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों का सम्मान

14 August, 2026, 8:46 pm


चंडीगढ़। पंजाब यूनिवर्सिटी के गोल्डन जुबली हॉल में शुक्रवार को सप्त सिंधु फ्रीडम आइकन अवार्ड्स कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में देश की आजादी के संघर्ष में योगदान देने वाले 24 स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत को याद करते हुए उनके परिजनों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अशोक भान ने की,जबकि अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी मुख्य अतिथि और पूर्व वेस्टर्न आर्मी कमांडर एवं पूर्व राज्य सूचना आयुक्त लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) केजे सिंह मुख्य वक्ता रहे। सतिंदर कौर सत्ती को गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में आमंत्रित किया गया।सम्मानित स्वतंत्रता सेनानियों में शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव, शहीद राजगुरु, शहीद ऊधम सिंह, शहीद करतार सिंह सराभा, शहीद अशफाक उल्ला खान, क्रांतिकारी दुर्गा देवी, कॉमरेड जगदीश चंदर, मास्टर केहर सिंह, भगत सिंह बाली, रणजीत सिंह नैनैवालिया, कपूर चंद, अश्वनी कुमार सैजपाल, केहर सिंह उर्फ करतार सिंह बठिंडा, जगलिदास, करतार सिंह तूर, मदन सिंह कपूर, हरदयाल सिंह (आई.एन.ए.), लेख राम खन्ना, तेजा सिंह, गुरदियाल सिंह, रोशन लाल आहूजा, चौधरी लाल चंद वर्मा और शमिंदर कौर शामिल रहे।

 स्वतंत्रता केवल अंग्रेजों को हटाने तक सीमित नहीं थी

अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख एवं कार्यक्रम के मुख्यातिथि प्रदीप जोशी ने कहा कि आज के कार्यक्रम की खास बात यह है कि यहां बड़ी संख्या में मातृशक्ति की गरिमामय उपस्थिति है। जब देश की माताएं जागती हैं और किसी विषय पर काम करने का संकल्प लेती हैं, तो देश का भाग्य भी बदलता है।उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई को केवल अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। भारत पर लंबे समय तक आक्रमण होते रहे और स्वतंत्रता का संघर्ष उन सभी परिस्थितियों से मुक्ति का व्यापक प्रयास था। उन्होंने कहा कि अंग्रेज भारत में केवल राजनीतिक सत्ता स्थापित नहीं करना चाहते थे, बल्कि देश के संसाधनों को अपने देश ले जाना और अपनी सभ्यता भारत पर थोपना चाहते थे। उनका उद्देश्य भारतीयों को राजनीतिक गुलाम के साथ सांस्कृतिक और आर्थिक गुलाम बनाना भी था।प्रदीप जोशी ने कहा कि अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं था। वास्तविक लक्ष्य उन व्यवस्थाओं और परंपराओं को फिर से स्थापित करना था, जिन्हें लंबे समय के विदेशी शासन ने कमजोर किया। उन्होंने स्वधर्म, स्वशिक्षा, स्वदेशी और स्वराज्य को उस दौर की चतुरसूत्री बताते हुए कहा कि देश के अनेक लोगों ने अलग अलग क्षेत्रों में इसके लिए काम किया।उन्होंने महान वैज्ञानिक प्रफुल्ल चंद्र रे और जगदीश चंद्र बसु का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने अंग्रेजी दबाव के बावजूद भारत के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने डा. बीआर अंबेडकर, लाला लाजपत राय और अन्य महान व्यक्तित्वों के योगदान को भी याद किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता सेनानियों से प्रेरणा लेकर अब देश के लिए मरना ही नहीं, बल्कि देश के लिए जीना भी सीखना होगा।

 जल संकट जैसी चुनौतियों पर किया आगाह

पूर्व वेस्टर्न आर्मी कमांडर एवं पूर्व राज्य सूचना आयुक्त लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) केजे सिंह ने स्वतंत्रता दिवस की बधाई देते हुए कार्यक्रम में पहुंचे क्रांतिकारियों, शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को सलाम किया। उन्होंने सप्त सिंधु की गतिविधियों की सराहना की और कहा कि आने वाले समय में जल संकट जैसी चुनौतियां गंभीर रूप ले सकती हैं। उन्होंने समाज से ऐसे अभियानों से जुड़कर सकारात्मक कदम उठाने का आह्वान किया।उन्होंने कहा कि भारत की आजादी में महात्मा गांधी के योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस सहित अनगिनत क्रांतिकारियों के योगदान के बिना आजाद भारत की कल्पना अधूरी है।

जस्टिस अशोक भान ने कहा, शहीदों के परिवारों के संघर्ष को भी याद रखना जरूरी

कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अशोक भान ने की। उन्होंने कहा कि देश के लिए अपना जीवन और परिवार का सुख त्यागने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों ने भी बहुत बड़ा संघर्ष किया है। उन्होंने अपने परिवार का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके परिवार में भी ऐसे लोग रहे, जो कम पढ़े लिखे और किसान थे, लेकिन उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन लगा दिया।जस्टिस भान ने कहा कि स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने लोगों से अपने इतिहास को याद रखने और शहीदों तथा क्रांतिकारियों से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। उन्होंने सेल्युलर जेल में दी गई गंभीर यातनाओं को याद करते हुए कहा कि वहां कष्ट झेलने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को भी कभी नहीं भूलना चाहिए।

जी चाहता है, मैं भी कह दूं,फिर आऊंगा, फिर आऊंगा,पर मजहब से बंधा हूं,मुसलमान हूं…

कार्यक्रम में सम्मान के दौरान स्वतंत्रता सेनानी,क्रांतिकारी और शहीदों के परिजन भावुक हुए और अपने बात को साझा किया। इस दौरान अशफाक उल्ला खां के वंशज ने अपने संबोधन के दौरान महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल जी की उन पंक्तियों को ताजा किया,जिसमें वे कहते थे कि  शायद ये दर्द साथ जाएगा,न जाने हिंदुस्तान कब आजाद कहलाएगा,फिर आऊंगा फिर आऊंगा,भारत मां तुझे आजाद कराऊंगा। इन पंक्तियों पर अशफाक जी के कथन को उनके वंशज ने ताजा करते हुए। कहा कि उन्होंने कहा था कि "जी चाहता है, मैं भी कह दूं,फिर आऊंगा, फिर आऊंगा….पर मजहब से बंधा हूं,मुसलमान हूं,पुर्नजन्म की बात नही कर पाता हूं,हां अगर कहीं खुदा मिल गया तो झोली फैला दूंगा और दूसरा जन्म मांगूंगा और फिर आऊंगा फिर आऊंगा और भारत मां तुझे आजाद कराऊंगा।अशफाक जी के वंशज ने बताया कि फांसी से पहले जब फैजाबाद जेल में परिवार के सदस्य मिले थे तो उन्होंने कहा था कि परिवार में किसी का नाम मेरे नाम पर जरुर रखना,मैं खुशनसीब हूं कि मेरा नाम उन महान शख्शियत के नाम पर रखा गया।

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