पुराण से समकालीन कला तक: प्रतिमा अंभगे की पेंटिंग्स में भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक चेतना का संसार

मुंबई। भारतीय दर्शन, संस्कृति और पौराणिक आख्यानों को अपनी विशिष्ट दृश्य भाषा में अभिव्यक्त करने वाली कलाकार एवं लेखिका प्रतिमा अंभगे की सोलो आर्ट प्रदर्शनी “Purakalpah: Adbhut Rasa – Sacred Portal to the Divinity Within” इन दिनों मुंबई की प्रतिष्ठित जहांगीर आर्ट गैलरी में दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर रही है। प्रदर्शनी 30 अगस्त तक चलेगी।
प्रतिमा अंभगे की कला को समझने के लिए उनके कैनवास पर दिखाई देने वाले पौराणिक प्रतीकों और कथाओं के पीछे छिपे दार्शनिक अर्थों को समझना जरूरी है। उनकी पेंटिंग्स में भारतीय पुराण केवल अतीत की कहानियां नहीं हैं, बल्कि वे वर्तमान मनुष्य की चेतना, संघर्ष, आध्यात्मिक खोज और जीवन के मूल प्रश्नों से संवाद करते दिखाई देते हैं।
पेंटिंग में कथा नहीं, दर्शन तलाशती हैं प्रतिमा
प्रतिमा अंभगे की कला की एक खास विशेषता यह है कि वह पौराणिक प्रसंगों को हूबहू चित्रित करने के बजाय उन्हें अपनी कल्पना और समकालीन संवेदना के माध्यम से पुनर्परिभाषित करती हैं। उनके चित्रों में आकृतियां, प्रतीक, रंग और संरचनाएं मिलकर एक ऐसा दृश्य संसार निर्मित करते हैं जहां दर्शक के सामने एक कथा भी होती है और उस कथा के भीतर छिपा दार्शनिक प्रश्न भी।
उनकी कला में अद्भुत रस का विशेष महत्व दिखाई देता है। विस्मय केवल किसी दृश्य को देखकर उत्पन्न होने वाला भाव नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर झांकने की प्रक्रिया बन जाता है। यही भावना उनकी वर्तमान प्रदर्शनी के शीर्षक “Sacred Portal to the Divinity Within” में भी दिखाई देती है—अर्थात कला के माध्यम से भीतर मौजूद दिव्यता तक पहुंचने का एक मार्ग।
समुद्र मंथन’ में जीवन का द्वंद्व और मंथन
प्रतिमा अंभगे के चर्चित works में ‘समुद्र मंथन’ विशेष उल्लेखनीय है। भारतीय पुराण परंपरा में समुद्र मंथन देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष तथा अमृत की प्राप्ति की कथा है, लेकिन कलाकार इसे केवल धार्मिक आख्यान के रूप में नहीं देखतीं।
उनकी कला में समुद्र मंथन जीवन के उस निरंतर मंथन का प्रतीक बन जाता है जिसमें सकारात्मक और नकारात्मक शक्तियां, प्रकाश और अंधकार तथा संघर्ष और सृजन एक साथ मौजूद रहते हैं। अमृत की प्राप्ति से पहले विष का निकलना इस बात का प्रतीक भी है कि किसी सार्थक उपलब्धि तक पहुंचने के लिए भीतर और बाहर के संघर्ष से गुजरना पड़ता है।
‘शिव धनुष’ में शक्ति और चेतना का प्रतीक
उनके चर्चित works में ‘शिव धनुष’ भी उल्लेखनीय है। रामायण के प्रसंग से जुड़े इस प्रतीक को कलाकार केवल शक्ति प्रदर्शन के रूप में नहीं देखतीं। शिव धनुष यहां शक्ति, सामर्थ्य, आत्मविश्वास और उस आंतरिक क्षमता का प्रतीक बन जाता है जिसके सामने असंभव दिखाई देने वाली चुनौतियां भी संभव हो सकती हैं।
इसी तरह ‘जानकी लिफ्टिंग’ जैसे work में भी पौराणिक चरित्र को पारंपरिक सीमाओं से बाहर देखने का प्रयास दिखाई देता है। प्रतिमा अंभगे के लिए मिथकीय पात्र स्थिर और जड़ चरित्र नहीं, बल्कि ऐसे प्रतीक हैं जिनके माध्यम से आज के समय में शक्ति, स्त्रीत्व, चेतना और मानवीय संवेदनाओं पर बातचीत की जा सकती है।
कलाकार के साथ लेखिका भी
प्रतिमा अंभगे कलाकार होने के साथ-साथ लेखिका भी हैं। शायद यही कारण है कि उनकी पेंटिंग्स में कहानी कहने की क्षमता दिखाई देती है। उनके कैनवास पर मौजूद प्रतीक दर्शक को किसी एक अर्थ तक सीमित नहीं करते, बल्कि अपनी-अपनी व्याख्या की संभावना पैदा करते हैं।
उनकी कला में भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा जुड़ाव दिखाई देता है, लेकिन यह जुड़ाव केवल परंपरा को दोहराने तक सीमित नहीं है। वह परंपरा से संवाद करती हैं और उसे समकालीन कला के संदर्भ में नए अर्थ देती हैं।
पूराकल्प’ से ‘Purakalpah’ तक कला यात्रा
प्रतिमा अंभगे की इसी कलात्मक दृष्टि का विस्तार उनकी पहले आयोजित एकल प्रदर्शनी पूराकल्प’ में भी देखने को मिला था, जिसका आयोजन ललित कला अकादमी में हुआ था। उस प्रदर्शनी में ‘समुद्र मंथन’, ‘जानकी लिफ्टिंग’ और ‘शिव धनुष’ जैसे works को कला प्रेमियों और दर्शकों से विशेष सराहना मिली थी।
अब जहांगीर आर्ट गैलरी में आयोजित Purakalpah’ उसी रचनात्मक यात्रा को आगे बढ़ाती दिखाई देती है। यहां कलाकार पुराण, दर्शन और आध्यात्मिकता को समकालीन दृश्य भाषा में प्रस्तुत करते हुए दर्शक को भारतीय ज्ञान परंपरा को एक नए नजरिए से देखने का अवसर देती हैं।
कला के माध्यम से भीतर की यात्रा
प्रतिमा अंभगे की पेंटिंग्स का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शायद यही है कि उनका उद्देश्य केवल आंखों को आकर्षित करना नहीं, बल्कि दर्शक को सोचने के लिए प्रेरित करना है। उनके लिए पौराणिक कथा एक शुरुआत है और उसका वास्तविक अर्थ उस समय खुलता है जब दर्शक उसे अपने जीवन और अनुभव से जोड़कर देखता है।
जहांगीर आर्ट गैलरी में लगी “Purakalpah: Adbhut Rasa – Sacred Portal to the Divinity Within” इस अर्थ में केवल एक कला प्रदर्शनी नहीं, बल्कि भारतीय मिथक, दर्शन और आधुनिक संवेदना के बीच संवाद का प्रयास है।
प्रतिमा अंभगे की कला दर्शक को बाहर दिखाई देने वाली पौराणिक दुनिया से उठाकर उसके भीतर मौजूद ‘दिव्यता’ की तलाश तक ले जाने का प्रयास करती है—और यही इस प्रदर्शनी की सबसे बड़ी विशेषता है।
रिपोर्ट: नरेश वत्स









.jpeg)
.jpg)
.png)











YXG8.jpeg)



