तान्हा पोला : नन्हे हाथो मे महाराष्ट्र के कृषि संस्कृती की मशाल

लेखक -प्रवीण बागडे
नागपुर, 9 सितंबर 2026। श्रावण समाप्त होने को आता है और भाद्रपद के आगमन की आहट सुनाई देने लगती है, तब महाराष्ट्र की ग्रामीण संस्कृति में एक अनोखा उत्साह दिखाई देता है। घर-घर में तैयारी शुरू हो जाती है ‘तान्हा पोला’ की। बड़ों का पोला बैलों के परिश्रम को नमन करने वाला पर्व है, तो तान्हा पोला उसी संस्कृति की पहचान नन्हे हाथों में सौंपने वाला संस्कारों का उत्सव है। मिट्टी के बैलों को सजाकर, उनकी पूजा करके और उनकी शोभायात्रा निकालते बच्चों को देखकर महसूस होता है कि परंपरा आज भी जीवित है; जरूरत सिर्फ इतनी है कि उसका वारसा अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की जिम्मेदारी हम निभाएँ। नन्हे हाथों में बैल और महान संस्कृति की कहानी। तान्हा पोला बच्चों के लिए आनंद, उत्साह और जिज्ञासा का पर्व है। बाजार से लाए गए मिट्टी या लकड़ी के बैलों को रंगा जाता है। उन्हें फूलों की माला पहनाई जाती है। माथे पर कुंकुम लगाया जाता है। छोटी-सी सजी हुई रथ, बैलगाड़ी या बैलों की जोड़ी लेकर बच्चे घरों से बाहर निकलते हैं। देखने में यह केवल खेल जैसा लगता है, लेकिन इसके पीछे संस्कारों की बड़ी पूंजी छिपी होती है।
तान्हा पोळा पर्व नहीं, बल्कि संस्कारों की पाठशाला
अन्न कहाँ से आता है? किसान किसके लिए मेहनत करता है? खेती में बैल का योगदान क्या है? पशु-पक्षियों के प्रति मनुष्य का व्यवहार कैसा होना चाहिए?’ इन प्रश्नों के उत्तर बच्चों को किसी पाठ्यपुस्तक की तुलना में तान्हा पोळा अधिक सहजता से सिखा सकता है। आज के डिजिटल युग में बच्चों के हाथों में मोबाइल है, लेकिन उन्हीं हाथों में यदि किसी दिन मिट्टी का बैल आ जाए, तो उन हाथों को अपनी मिट्टी की पहचान होती है। स्क्रीन की आभासी दुनिया की तुलना में मिट्टी से बना बैल उन्हें श्रम, खेती और संस्कृति से जोड़ता है। यह केवल पर्व नहीं, बल्कि संस्कारों की पाठशाला है!आज बच्चों की शिक्षा का बड़ा हिस्सा किताबों, मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों के इर्द-गिर्द घूमता है। ज्ञान का विस्तार हुआ है, लेकिन मिट्टी से जुड़ा रिश्ता कुछ कमजोर होता दिखाई देता है। ऐसे समय में तान्हा पोले जैसी लोकपरंपराओं का महत्व और बढ़ जाता है।
महाराष्ट्र की कृषि संस्कृति में बैल का विशेष महत्व
बच्चों द्वारा बैल की पूजा करना अंधानुकरण नहीं है। इसके माध्यम से जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम और कृतज्ञता की भावना विकसित की जा सकती है। किसान और पशुधन के बीच का संबंध समझा जा सकता है। हमारी थाली में आने वाले अन्न के पीछे कितनी मेहनत छिपी है, इसका एहसास कराया जा सकता है। इसलिए माता-पिता को तान्हा पोळा केवल बच्चों को बाहर भेजने का कार्यक्रम न मानकर उनसे संवाद करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए। बैल की पीठ पर केवल हल नहीं होता, बल्कि संस्कृति का भार भी होता है। महाराष्ट्र की कृषि संस्कृति में बैल का विशेष महत्व है। मशीनों के युग से पहले किसान की खेती का सबसे विश्वसनीय साथी बैल ही था। जुताई, वखरणी, मड़ाई जैसे अनेक कृषि कार्यों में उसने किसान का साथ दिया। आज ट्रैक्टर और आधुनिक मशीनों ने खेती का स्वरूप बदल दिया है। इसलिए बैल का पारंपरिक महत्व कुछ कम जरूर हुआ है, लेकिन कृतज्ञता की भावना कम होने का कोई कारण नहीं है। तान्हा पोळा उसी कृतज्ञता से बच्चों का परिचय कराने वाला पर्व है।
शहरीकरण का असर इस परंपरा पर
बच्चों को मिट्टी के बैल को फूलों की माला पहनाते समय वास्तविक खेत के बैल को प्रेम से सहलाने का संस्कार भी सीखना चाहिए। पशुओं को तकलीफ देना, उन्हें भूखा रखना या केवल त्योहार के दिन उनका सम्मान करना एक विरोधाभास है। पूजा एक दिन की हो सकती है, लेकिन प्रेम और जिम्मेदारी पूरे वर्ष की होनी चाहिए। पहले गांव-गांव में तान्हा पोला बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता था। बच्चों की टोलियाँ बैलों की जोड़ियाँ लेकर घर-घर जाती थीं। बड़े लोग उन्हें प्यार से देखते और खाने-पीने की चीजें देते थे। आज शहरीकरण के कारण कई स्थानों पर यह परंपरा सीमित होती जा रही है। बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो गई हैं, लेकिन बच्चों को खेत कहाँ है, बैल कैसा होता है और जुताई कैसे होती है, इसकी जानकारी कम होती जा रही है।इसमें बच्चों की कोई गलती नहीं है। हम उन्हें अपनी संस्कृति से परिचित कराने में कहीं न कहीं पीछे रह गए हैं। स्कूलों, अभिभावकों और सामाजिक संस्थाओं को तान्हा पोळा अधिक अर्थपूर्ण तरीके से मनाना चाहिए। मिट्टी के बैल बनाने की कार्यशालाएँ, पारंपरिक खेल, किसानों के साथ संवाद, कृषि प्रदर्शन और पशुसंवर्धन संबंधी जानकारी जैसे उपक्रमों के माध्यम से इस पर्व को आधुनिक संदर्भ दिया जा सकता है।
तान्हा पोळा देता है सामाजिक समानता का संदेश
तान्हा पोले का एक और सुंदर पहलू मिट्टी से जुड़ाव है। मिट्टी का बैल हाथ में लेते हुए बच्चों को मिट्टी का महत्व समझ में आता है। इसलिए प्लास्टिक की सजावटी वस्तुओं के बजाय मिट्टी, कागज, कपड़े, फूल और प्राकृतिक वस्तुओं के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। त्योहार मनाते समय पर्यावरण का विचार करना आज की आवश्यकता है। तेज आवाज, प्लास्टिक का अनावश्यक उपयोग और कचरा पैदा करने वाली वस्तुओं से बचते हुए तान्हा पोळा ‘परंपरा और पर्यावरण’ का सुंदर संगम बन सकता है। तान्हा पोले की एक और विशेषता यह है कि इसमें भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं होता। बच्चों के हाथों में मिट्टी के बैल किस घर से आए हैं या किसी परिवार की आर्थिक स्थिति क्या है, इसका कोई महत्व नहीं होता। सभी बच्चे एक साथ आते हैं, खेलते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं। बचपन की दुनिया में जाति, धर्म और अमीरी-गरीबी की दीवारें नहीं होतीं; ये दीवारें बड़े लोग खड़ी करते हैं। इसलिए तान्हा पोळा हमें सामाजिक समानता का संदेश भी देता है। बच्चों की मासूम दुनिया की यह एकता बड़ों के लिए भी सीखने योग्य है।
बैलों की जोड़ी केवल खिलौना नहीं होती; वह हमारी कृषि संस्कृति का प्रतीक
परंपरा को बचाना यानी अतीत में अटके रहना नहीं है। बल्कि परंपरा में मौजूद अच्छे मूल्यों को अपनाकर उन्हें वर्तमान से जोड़ना है। तान्हा पोले के माध्यम से बच्चों को किसान का सम्मान, पशुप्रेम, पर्यावरण संरक्षण, श्रम की प्रतिष्ठा, सामाजिक समानता और कृतज्ञता सिखाई जा सकती है।आज बच्चों को सफल बनने की प्रतिस्पर्धा सिखाई जाती है, लेकिन संवेदनशील इंसान बनने की शिक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। तान्हा पोला यह शिक्षा सहजता से दे सकता है। संस्कारों की यह शोभायात्रा आगे भी चलती रहे! मिट्टी का छोटा-सा बैल हाथ में लेकर सड़कों से गुजरते नन्हे बच्चों की आँखों में अपार खुशी होती है। उनके हाथों में मौजूद वह बैलों की जोड़ी केवल खिलौना नहीं होती; वह हमारी कृषि संस्कृति की अगली पीढ़ी तक पहुँचने वाली मशाल होती है। आज हमें उस मशाल की रक्षा करनी होगी।
बच्चों को मिट्टी से जोड़े
बच्चों को मोबाइल की स्क्रीन के बाहर की दुनिया दिखाएँ। उन्हें मिट्टी से जोड़ें। किसान के पसीने की कीमत समझाएँ। उन्हें पशुओं से प्रेम करना सिखाएँ। और सबसे महत्वपूर्ण बात, परंपरा क्यों बचानी है, इसका बोध कराएँ। क्योंकि तान्हा पोला केवल बच्चों का पर्व नहीं है, बल्की यह हमारी संस्कृति के भविष्य का प्रश्न है।
आज बच्चों के हाथ में मिट्टी का बैल दिया, तो कल उनके मन में इंसानियत की खेती होगी। यही तान्हा पोला की वास्तविक समृद्धि है, यही इस उत्सव की असली पहचान है और यही आनेवाली पीढ़ी के लिए हमारी सच्ची जिम्मेदारी है।सभी बालमित्रों, अभिभावकों, किसान भाइयों और महाराष्ट्र की समस्त जनता को तान्हा पोले की हार्दिक एवं मंगलमय शुभकामनाएँ!


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