वंदे मातरम् श्रीमन भागवत जी: विचार, संगठन और राष्ट्रसेवा की दीर्घ यात्रा....

11 September, 2026, 3:12 pm

 

11 सितंबर | जन्मदिवस विशेष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का जीवन संगठन, अनुशासन, राष्ट्रचिंतन और सामाजिक सरोकारों की लंबी यात्रा का उदाहरण है। 11 सितंबर 1950 को महाराष्ट्र के चंद्रपुर में जन्मे मोहन मधुकरराव भागवत आज भारतीय सार्वजनिक जीवन में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं। उनके जन्मदिन पर उन्हें वंदे मातरम् के साथ हार्दिक शुभकामनाएं।

मोहन भागवत का जन्म ऐसे परिवार में हुआ, जिसकी कई पीढ़ियां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य से जुड़ी रही हैं। उनके पिता मधुकरराव भागवत चंद्रपुर क्षेत्र में संघ के प्रमुख कार्यकर्ताओं में रहे और गुजरात के प्रांत प्रचारक का दायित्व भी निभाया। मधुकरराव भागवत ने ही आगे चलकर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का संघ से परिचय कराया था। परिवार के संस्कारों ने मोहन भागवत के व्यक्तित्व और उनके राष्ट्रजीवन के प्रति दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया।

चंद्रपुर के लोकमान्य तिलक विद्यालय से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने जनता कॉलेज, चंद्रपुर से बीएससी प्रथम वर्ष तक अध्ययन किया। इसके बाद पंजाबराव कृषि विद्यापीठ, अकोला से पशु चिकित्सा एवं पशुपालन में स्नातक की डिग्री हासिल की। उन्होंने पशु चिकित्सा में स्नातकोत्तर अध्ययन भी शुरू किया, लेकिन देश में लगे आपातकाल ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

1975 का आपातकाल भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का एक निर्णायक दौर था। इसी समय मोहन भागवत ने अपना स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम अधूरा छोड़कर संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक के रूप में कार्य करने का निर्णय लिया। आपातकाल के दौरान उन्होंने भूमिगत रहकर संगठनात्मक गतिविधियों में भूमिका निभाई। यह दौर उनके लिए केवल राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों को समझने का नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में संगठन और विचार के प्रति प्रतिबद्धता का भी दौर था।

आपातकाल के बाद 1977 में उन्हें महाराष्ट्र के अकोला का प्रचारक बनाया गया। इसके बाद वे नागपुर और विदर्भ क्षेत्र में संघ के विभिन्न दायित्वों पर रहे। संगठन के भीतर उनकी कार्यशैली, संवाद क्षमता और संगठनात्मक समझ ने उन्हें लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक पहुंचाया। 1991 में उन्हें संघ के स्वयंसेवकों के शारीरिक प्रशिक्षण कार्यक्रम का अखिल भारतीय प्रमुख बनाया गया। इस जिम्मेदारी को उन्होंने 1999 तक संभाला। उसी वर्ष उन्हें देशभर में पूर्णकालिक रूप से कार्यरत संघ प्रचारकों के प्रमुख का दायित्व दिया गया।

वर्ष 2000 संघ के इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया। के. एस. सुदर्शन के सरसंघचालक बनने के बाद मोहन भागवत को संघ का सरकार्यवाह चुना गया। संगठन के शीर्ष स्तर पर यह जिम्मेदारी उनके लंबे संगठनात्मक अनुभव और नेतृत्व क्षमता की स्वीकृति थी। लगभग नौ वर्ष बाद, 21 मार्च 2009 को उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सरसंघचालक मनोनीत किया गया।

सरसंघचालक के रूप में मोहन भागवत के सामने संघ को बदलते सामाजिक, राजनीतिक और तकनीकी परिवेश के अनुरूप आगे बढ़ाने की चुनौती रही है। उनके कार्यकाल में संघ ने सामाजिक समरसता, स्वदेशी, परिवार व्यवस्था, पर्यावरण, सेवा कार्य, शिक्षा, ग्राम विकास और राष्ट्र के प्रति नागरिक दायित्व जैसे विषयों पर लगातार जोर दिया है। उनके सार्वजनिक वक्तव्यों में कई बार यह बात सामने आई है कि संघ का उद्देश्य केवल सत्ता की राजनीति नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद और सामाजिक संगठन को मजबूत करना है।

मोहन भागवत की कार्यशैली को उनके समर्थक स्पष्टवादी, व्यावहारिक और संगठन-केंद्रित मानते हैं। वे संघ और राजनीतिक दलों के बीच अंतर बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर देते रहे हैं। भारतीय राजनीति में संघ के प्रभाव को देखते हुए उनकी भूमिका स्वाभाविक रूप से चर्चा और विश्लेषण का विषय बनी रहती है, लेकिन भागवत स्वयं संघ को एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करने पर जोर देते रहे हैं।

उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनका व्यापक देश-विदेश भ्रमण और विभिन्न वर्गों के लोगों से संवाद है। वे समाज के भीतर संवाद को विचार-विस्तार और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते हैं। बदलते भारत में परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता जैसे विषय उनके सार्वजनिक चिंतन के प्रमुख हिस्से रहे हैं।

11 सितंबर का दिन इसलिए केवल एक जन्मदिन नहीं, बल्कि उस यात्रा को स्मरण करने का अवसर भी है, जिसने एक पशु चिकित्सक बनने की दिशा में बढ़ रहे युवा को संघ के सर्वोच्च दायित्व तक पहुंचाया। चंद्रपुर से शुरू हुई यह यात्रा आपातकाल की कठिन परिस्थितियों, दशकों के संगठनात्मक अनुभव और अंततः संघ के नेतृत्व तक पहुंची।

 

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