दुनिया की सबसे लंबी स्टील स्लैग रोड बनाकर जिंदल स्टील ने रचा इतिहास, बना गिनीज रिकॉर्ड

12 September, 2026, 6:50 pm

नई दिल्ली, 12 सितंबर 2026।  छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में जिंदल स्टील ने देश के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। जिंदल स्टील ने फैक्ट्री से निकलने वाले स्टील कचरे (स्टील स्लैग) का 100 प्रतिशत इस्तेमाल करके 1.85 किलोमीटर लंबी 4- लेन की एक सड़क बनाई है। खास बात यह है कि पूरी तरह से प्रोसेस  किए गए स्टील स्लैग से बनी यह दुनिया की सबसे लंबी सड़क है जिसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया है। 

कचरे से कंचन वेस्ट टू वेल्थ का सपना साकार 

कचरे से कंचन (वेस्ट टू वेल्थ) का सपना साकार करने वाले की सड़क के निर्माण में तकरीबन 2 लाख टन  प्रोसेस्ड स्टील स्लैग का इस्तेमाल हुआ है । इससे प्राकृतिक पत्थरों की खुदाई और खनन पर निर्भरता खत्म हुई है। यह सड़क सिर्फ दिखाने के लिए नहीं, बल्कि भारी कमर्शियल गाड़ियों ट्रक आदि की आवाजाही को ध्यान में रखकर बेहद मजबूत बनाई गई है । इससे पैसे और संसाधनों की बचत होगी। ‌ ये जानकारी देना महत्वपूर्ण है कि पारंपरिक सड़कों के मुकाबले यह सड़क लगभग 35 प्रतिशत पतली है और इसे बनाने में करीब 40 प्रतिशत लागत की बचत हुई है। 


जिंदल स्टील, सीएसआईआर और सड़क अनुसंधान संस्थान ने मिलकर बनाई सड़क 

जिंदल स्टील ने  सीएसआईआर और सड़क अनुसंधान संस्थान के मिलकर इस स्लैग  को वैज्ञानिक प्रक्रिया मसलन क्रशिंग ,मेटल निकलना और ग्रेडिंग) के जरिए सड़क बनाने लायक पत्थरों में बदला और सड़क की सबसे निकली परत से लेकर ऊपरी डामर (बिटुमिन) की परत तक इसी का इस्तेमाल किया। सभी कड़े पर्यावरणीय परीक्षणों के बाद ही इसे मंजूरी दी गई। जिंदल स्टील के चेयरमैन श्री नवीन जिंदल ने इस अवसर पर कहा कि भारत की तरक्की ऐसे नए प्रयोगों से होनी चाहिए जो पर्यावरण को बचाते हुए देश को फायदा पहुंचाएं। यह तकनीक दिखाती है कि कैसे उद्योग का कचरा देश के  निर्माण का जरिया बन सकता है। केंद्रीय मंत्री विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी स्वतंत्र प्रभार डॉक्टर जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह प्रोजेक्ट &#39, वेस्ट टू वेल्थ &#39 कचरे से संपत्ति के सपने को साकार करता है। यह साबित करता है कि हमारी स्वदेशी तकनीक से देश की बड़ी समस्याओं का हल निकाला जा सकता है। ‌जिंदल स्टील ने प्रोसेस्ड स्लैग का नाम स्टील ग्रीट रखा है। इसका लोगों आज लोकार्पित किया गया। इस तकनीक को देशभर में बाकी सड़कों के निर्माण में इस्तेमाल करने के लिए एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए हैं।

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