सांस्कृतिक स्मृति की संरक्षक के रूप में महिला , वारली कलाकार सुमित्रा अहाके

भारत के कई आदिवासी समुदायों में, महिलाओं ने दृश्य परंपराओं को संरक्षित रखने में लंबे समय से बड़ी भूमिका निभाई है। त्योहारों के दौरान घरों की मिट्टी की दीवारों को सजाने से लेकर कला के माध्यम से प्रकृति, फसल और अनुष्ठानों की कहानियों को कहने तक, महिलाएं सांस्कृतिक स्मृतियों और रचनात्मकता की संरक्षक रही हैं।
प्रकृति में रची-बसी कला
महाराष्ट्र के अमरावती की रहने वाली वारली कलाकार सुमित्रा अहाके, 38 के लिए कला केवल अभिव्यक्ति का एक माध्यम नहीं, बल्कि आदिवासी समुदायों और प्रकृति के बीच गहरे आध्यात्मिक संबंध का प्रतिबिंब है। करीब चौदह वर्ष से वारली चित्रकला का अभ्यास कर रही सुमित्रा सरल ज्यामितीय आकृतियों और लयबद्ध पैटर्न का इस्तेमाल कर खेती, कटाई, नृत्य और सामुदायिक समारोहों के दृश्यों को चित्रित करती हैं।
संगीत एवं नृत्य का उत्सव
"हमारे समुदाय में प्रकृति को ही देवता माना जाता है। फसल काटने जैसे काम शुरू करने से पहले हम प्रार्थना करते हैं और धरती और जंगल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।"इनमें से कई रीति-रिवाज वारली चित्रकला में झलकते हैं, जिनमें आमतौर पर प्रकृति की पूजा, सामुदायिक समारोह और मनुष्य व पर्यावरण के मध्य सामंजस्य का उत्सव मनाने वाले नृत्यों के दृश्य चित्रित होते हैं। सफल फसल कटाई के बाद, समुदाय स्थानीय देवताओं को पहली उपज अर्पित करता है और संगीत एवं नृत्य के साथ मिलकर उत्सव मनाता है - ये परंपराएं अक्सर चित्रों में भी दिखाई देती हैं।
शिक्षा से स्नातक सुमित्रा अपनी कलात्मक गतिविधियों के साथ-साथ बच्चों को पढ़ाने का काम भी करती हैं, जिसमें वे कला, संगीत और कहानी सुनाने के माध्यम से उन्हें उनकी सांस्कृतिक धरोहर से परिचित कराती हैं। प्रदर्शनियों, कला मेलों और ऑनलाइन मंच के माध्यम से वे अपने गांव से बाहर भी व्यापक दर्शकों तक पहुंचती हैं, इसके बाद भी उनका उद्देश्य समुदाय और सांस्कृतिक निरंतरता में दृढ़ता से निहित है।
इनपुट-पीआईबी


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