प्रदर्शनियों में इतिहास, संस्कृति और स्मृतियों से रूबरू करा रही यमुना

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) में आयोजित सातवें ‘नदी उत्सव’ में इस बार यमुना नदी के इतिहास, संस्कृति, पर्यावरण, जैव-विविधता और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन को कला और दृश्य माध्यमों के जरिए सामने लाया जा रहा है। 24 से 30 सितंबर तक चलने वाली छह प्रदर्शनियों के माध्यम से दर्शकों को यमुना को केवल एक नदी के रूप में नहीं, बल्कि दिल्ली और उत्तर भारत की सभ्यता, आस्था, लोकजीवन और सांस्कृतिक स्मृति के महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखने का अवसर मिल रहा है।
प्रदर्शनियों में यमुना की ऐतिहासिक यात्रा, उसके किनारे विकसित हुई सभ्यताओं, धार्मिक परंपराओं, लोक-संस्कृति और बदलते पर्यावरणीय स्वरूप को अलग-अलग कलात्मक माध्यमों के जरिए प्रस्तुत किया गया है। इनका उद्देश्य यमुना के साथ समाज के उस पुराने रिश्ते को सामने लाना है, जिसमें नदी जीवन और संस्कृति दोनों का केन्द्र रही है।
यमुना से जुड़ी कला और दृश्य सामग्री के माध्यम से यह भी दिखाया गया है कि समय के साथ नदी और उसके आसपास का सामाजिक जीवन किस तरह बदला। कभी दिल्ली के जीवन और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा रही यमुना आज प्रदूषण, शहरीकरण और अतिक्रमण जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। प्रदर्शनी इन बदलावों को केवल पर्यावरणीय संकट के तौर पर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक स्मृति के संकट के रूप में भी देखने का अवसर देती है।
नदी उत्सव में यमुना से जुड़ी जीवंत परंपराओं, धार्मिक आस्थाओं और लोक-स्मृतियों को भी विशेष महत्व दिया गया है। कृष्ण की कथाओं से लेकर दिल्ली के ऐतिहासिक विकास तक यमुना का उल्लेख भारतीय सांस्कृतिक चेतना में बार-बार दिखाई देता है। कला प्रदर्शनी इन्हीं विविध संदर्भों को एक साथ सामने लाकर यह सवाल उठाती है कि जिस नदी ने सदियों तक शहर और समाज को जीवन दिया, उसके साथ आज हमारा रिश्ता कैसा रह गया है।
प्रदर्शनी में चित्रों, दस्तावेजों और अन्य दृश्य माध्यमों के जरिए यमुना के अलग-अलग रूपों को देखने का अवसर मिलता है। कहीं नदी आस्था और परंपरा के रूप में दिखाई देती है तो कहीं इतिहास की साक्षी के रूप में। वहीं कुछ प्रस्तुतियां यमुना के बदलते स्वरूप और उसके सामने खड़े पर्यावरणीय संकट की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं।
नदी उत्सव के आयोजकों के अनुसार, इन प्रदर्शनियों का उद्देश्य केवल यमुना की वर्तमान स्थिति को दिखाना नहीं, बल्कि लोगों में नदी के प्रति सांस्कृतिक जुड़ाव और संरक्षण की चेतना को मजबूत करना भी है। कला के माध्यम से नदी की कहानी कहने की कोशिश इस विचार पर आधारित है कि किसी नदी का संरक्षण तभी व्यापक सामाजिक आंदोलन बन सकता है, जब उसके साथ लोगों का भावनात्मक और सांस्कृतिक रिश्ता भी मजबूत हो।
यमुना पर केन्द्रित ये प्रदर्शनियां दर्शकों को नदी के अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच संबंध देखने का अवसर देती हैं। एक ओर इनमें यमुना की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक महत्व दिखाई देता है, तो दूसरी ओर वर्तमान संकट यह सवाल खड़ा करता है कि आने वाली पीढ़ियों को हम कैसी यमुना सौंपना चाहते हैं।7वें नदी उत्सव में यमुना को केन्द्र में रखकर आयोजित ये कला प्रदर्शनियां इस संदेश को रेखांकित करती हैं कि यमुना सिर्फ पानी की धारा नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, आस्था और सामूहिक स्मृति की जीवंत धारा है।




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