धान की पराली जलाने पर रोकथाम, सीआरएम मशीनरी के प्रभावी उपयोग, सख्त प्रवर्तन और प्रदूषण के अन्य प्रमुख स्रोतों पर नियंत्रण पर जोर दिया गया

एनसीआर और आस-पास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने धान की पराली जलाने की घटनाओं को रोकने और नियंत्रित करने तथा वायु प्रदूषण के अन्य प्रमुख स्रोतों को कम करने के लिए उठाए जा रहे कदमों की समीक्षा करने के उद्देश्य से अपने अध्यक्ष श्री राजेश वर्मा की अध्यक्षता में, आज चंडीगढ़ में पंजाब और हरियाणा की सरकारों के साथ अलग-अलग समीक्षा बैठकें कीं। इस अवसर पर, जमीनी स्तर पर तुरंत कार्रवाई करने पर जोर दिया गया।
पंजाब सरकार के साथ हुई बैठक में, 15.05.2026 के सीएक्यूएम निर्देश संख्या 99 के अनुसार, धान की पराली जलाने को रोकने और नियंत्रित करने के लिए 'राज्य कार्य योजना' को लागू करने पर ध्यान केंद्रित किया गया। आयोग ने धान की पराली के प्रभावी प्रबंधन के लिए जमीनी स्तर पर लागू किए जा रहे उपायों, जिला-स्तरीय तैयारियों और निगरानी तंत्र की समीक्षा की।जिला और किसान स्तर पर फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) मशीनरी की उपलब्धता, तैनाती और उसके प्रभावी उपयोग की समीक्षा की गई। साथ ही, मशीनरी के उपयोग में आने वाली कमियों की पहचान की गई और धान के पराली को 'इन-सिटू' (खेत में ही) और 'एक्स-सिटू' (खेत के बाहर) तरीकों से इकट्ठा करने, ढोने और इस्तेमाल करने की व्यवस्थाओं पर चर्चा की गई। आयोग ने फसल अवशेष आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने और कटाई के मुख्य समय के दौरान उपलब्ध मशीनरी का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।बैठक में सैटेलाइट-आधारित फायर अलर्ट के जरिए आग से प्रभावित क्षेत्रों के आकलन के क्षेत्रीय सत्यापन पर चर्चा हुई। साथ ही, पराली जलाने की घटनाओं की निगरानी के लिए जिला स्तर पर ड्रोन और कम लागत वाले सेंसर तैनात करने पर भी बात हुई। इसके अलावा, सीएक्यूएम के निर्देश संख्या 92 (जिसके तहत ईंट-भट्टों में धान के पुआल से बने बायोमास पेलेट/ब्रिकेट का इस्तेमाल अनिवार्य है) के पालन और थर्मल पावर प्लांट में बायोमास को-फायरिंग के तय लक्ष्यों की दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा की गई।
हरियाणा सरकार के साथ हुई इस बैठक में वायु प्रदूषण के कई स्रोतों पर व्यापक चर्चा हुई। इनमें धान की पराली जलाना, वाहनों से होने वाला प्रदूषण, सड़कों और खुले इलाकों की धूल, निर्माण और विध्वंस (सीएंडडी) कार्यों से उड़ने वाली धूल, औद्योगिक प्रदूषण, और अन्य क्षेत्रों से जुड़े उपाय शामिल थे।धान की पराली जलाने के मुद्दे पर, आयोग ने राज्य कार्य योजना के क्रियान्वयन की समीक्षा की। इसमें जमीनी स्तर पर नियमों का पालन, सीआरएम मशीनों की तैनाती और उनका उपयोग, फसल अवशेषों की आपूर्ति-श्रृंखला का प्रबंधन, जली हुई जगहों के आकलन का जमीनी सत्यापन और पराली जलाने की घटनाओं की निगरानी के लिए ड्रोन तथा कम लागत वाले सेंसरों का इस्तेमाल शामिल था। इसके अलावा, ईंट-भट्टों में बायोमास पेलेट/ब्रिकेट के उपयोग से जुड़े निर्देश संख्या 92 के पालन और थर्मल पावर प्लांटों में बायोमास 'को-फायरिंग' (कोयले के साथ बायोमास का उपयोग) की प्रगति पर भी चर्चा की गई।वाहन प्रदूषण की समीक्षा में ईंधन और सीएनजी स्टेशनों पर स्वचालित नंबर प्लेट पहचान (एएनपीआर) प्रणाली की स्थापना शामिल है, ताकि वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (पीयूसीसी) से संबंधित आवश्यकताओं को लागू किया जा सके, वाहनों का जीवन समाप्त होने के खिलाफ कार्रवाई की जा सके, स्वच्छ गतिशीलता उपायों को अपनाया जा सके और एनसीआर जिलों में डीजल से चलने वाले ऑटो रिक्शा को चरणबद्ध तरीके से बंद करने की दिशा में प्रगति हो सके।
सड़क-धूल नियंत्रण और मशीनीकृत सड़क सफाई सहित सड़कों और खुले क्षेत्रों से धूल शमन के उपायों की भी समीक्षा की गई। आयोग ने सी एंड डी गतिविधियों से धूल उत्सर्जन को नियंत्रित करने और निर्धारित धूल-शमन उपायों के कार्यान्वयन के उपायों की भी जांच की। समीक्षा में औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण को भी शामिल किया गया, जिसमें लागू मानदंडों का अनुपालन और औद्योगिक इकाइयों और अन्य पहचाने गए स्रोतों से संबंधित निगरानी और प्रवर्तन उपाय शामिल हैं।
आयोग ने राज्य कार्य योजनाओं के समयबद्ध कार्यान्वयन, उनके प्रवर्तन और संबंधित राज्य विभागों, जिला प्रशासनों और प्रवर्तन एजेंसियों के बीच घनिष्ठ समन्वय के साथ निरंतर जमीनी स्तर पर निगरानी की आवश्यकता पर बल दिया। राज्यों को कार्यान्वयन संबंधी कमियों को प्राथमिकता के आधार पर दूर करने और संबंधित क्षेत्रों में समय पर सुधारात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने की सलाह दी गई। आयोग ने किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के लिए स्थानीय तंत्र उपलब्ध कराने और बाह्य तंत्र को मजबूत करने पर जोर दिया। हरियाणा और पंजाब की राज्य सरकारों को भी जमीनी स्तर पर आईईसी कार्य योजनाओं को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने की सलाह दी गई।
आयोग ने इस बात पर जोर दिया कि धान के पराली प्रबंधन को केवल पराली जलाने से रोकने के उपाय के रूप में ही नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने और 'सर्कुलर इकॉनमी' (चक्रीय अर्थव्यवस्था) पर आधारित एक मजबूत औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित करने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें धान के पुआल का एक संसाधन के रूप में अधिक से अधिक उपयोग हो सके। आयोग ने जमीनी स्तर पर त्वरित कार्रवाई करने का आह्वान किया और जिला प्रशासनों को चेतावनी दी कि यदि किसी भी तरह की लापरवाही के कारण पराली जलाने की घटनाओं में वृद्धि होती है, तो इसे बहुत गंभीरता से लिया जाएगा।
सीएक्यूएम ने फिर से दोहराया कि धान की पराली जलाने की घटनाओं को प्रभावी ढंग से रोकने और वायु प्रदूषण को पूरी तरह से कम करने के लिए - विशेष रूप से सर्दियों के नाजुक समय के दौरान - राज्य सरकारों और सभी संबंधित एजेंसियों द्वारा निरंतर और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।


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