यमुना का पुनर्जीवन पर्यावरणीय और सांस्कृतिक, दोनों दृष्टियों से मिशन होना चाहिए – सरदार तरनजीत सिंह संधू, उपराज्यपाल,

25 September, 2026, 10:07 am


नई दिल्ली, 25 सितंबर ।इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के जनपद सम्पदा विभाग द्वारा विश्व नदी दिवस के अवसर पर आयोजित तीन दिवसीय सातवें ‘नदी उत्सव’ का भव्य शुभारंभ हुआ। 24 से 26 सितंबर 2026 तक आयोजित इस तीन दिवसीय उत्सव के उद्घाटन समारोह में दिल्ली के माननीय उपराज्यपाल सरदार तरनजीत सिंह संधू मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु, लेखक एवं दार्शनिक स्वामी अवधेशानंद गिरि मुख्य वक्ता तथा प्रसिद्ध कथक गुरु, नृत्यांगना एवं नृत्य निर्देशक पद्म श्री डॉ. शोभना नारायण सम्मानित अतिथि के रूप में शामिल हुईं। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए न्यास के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने की। आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने स्वागत संबोधन दिया। इस अवसर पर नदियों पर आधारित कविता संकलन और छठे नदी उत्सव में प्रस्तुत किए शोध-पत्रों की पुस्तिका का भी लोकार्पण किया गया।


इस वर्ष का नदी उत्सव विशेष रूप से यमुना नदी के इतिहास, संस्कृति, पर्यावरण, जैव-विविधता, जीवंत विरासत और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के विभिन्न आयामों को केंद्र में रखकर आयोजित किया जा रहा है। इस अवसर पर मुख्य अतिथि सरदार तरनजीत सिंह संधू ने कहा, भारत का नदियों के साथ सम्बंध हजारों वर्षों पुराना है और देश के नगर, सभ्यताएं, साहित्य, संगीत, कला और परंपराएं नदियों से गहराई से जुड़ी रही हैं। मैं पंजाब से हूं, जो पांच नदियों की भूमि है। नदियां समुदायों की आत्मा, संस्कृति और जीवन को अपने भीतर समेटे हुए हैं।
यमुना के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति में इसका विशेष स्थान है और इसका सम्बंध भगवान श्रीकृष्ण की कथा से अभिन्न रूप से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि दिल्ली का विकास यमुना के साथ हुआ है, जो आज शहरीकरण और प्रदूषण के दबाव का सामना कर रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यमुना का पुनर्जीवन पर्यावरणीय और सांस्कृतिक, दोनों दृष्टियों से एक मिशन होना चाहिए, जिसके लिए निरंतर सरकारी प्रयासों, जन-जागरूकता और नदी के साथ सांस्कृतिक सम्बंध को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक संस्थाएं शोध, फिल्मों, प्रदर्शनियों, संगोष्ठियों और जन कार्यक्रमों के माध्यम से नदियों के साथ लोगों का सम्बंध पुनर्स्थापित करने में योगदान दे सकती हैं। इसके लिए सरकारी एजेंसियों, विशेषज्ञों, संस्थानों, नागरिक समाज और नागरिकों के बीच निरंतर सहयोग आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यमुना ने सदियों से दिल्ली को बहुत कुछ दिया है और वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है कि वह यमुना को कुछ वापस दे। 


स्वामी अवधेशानंद गिरि ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा, नदी सभ्यता को जन्म देती है और वहां जीवन खिलता है। नदी में प्राण है, नदी में जीवन है। जितनी भी सभ्यताएं हैं, वे नदियों के तट पर ही विकसित हुई हैं। नदियों के तटों पर तप भी हुआ है और अमृत की खोज भी। नारायण की सत्ता नीर से ही हैं। गंगा स्नान के लिए है, यमुना आचमन के लिए। यमुना में इतनी पवित्र कोमलता और संवेदनशीलता है। यमुना के लिए स्नान का विधान नहीं, आचमन का विधान है। दिल्ली में बावड़ियां और कुएं थे। सौ-डेढ़ सौ साल पहले दिल्ली इतनी सजग और अपनी यमुना के प्रति इतनी प्रतिबद्ध थी कि यमुना के जल का उपयोग नहीं किया जाता था। हमारी दिल्ली बावड़ियों और कुओं के लिए जानी जाती थी। लेकिन आज यमुना स्पर्श के योग्य नहीं है। यह हुआ क्या? वह कालिया नाग आज भी जीवित है, अपशिष्ट और भयानक प्रदूषण के रूप में। जो दिल्ली कभी यमुना का जल नहीं पीती थी और उसमें स्नान नहीं करती थी, आज उसी यमुना की स्थिति ऐसी हो गई है। यमुना कृष्ण की पटरानी हैं। उनकी की ठकुराईन हैं। नदियां दो प्रकार की हैं। एक, हिमनद से पिघलकर नदी बनती हैं और एक वृक्षों की जड़ों से जन्म लेती हैं। तो हम वनस्पतियों की चिंता करें, वृक्ष लगाएं। नदियों के किनारे जो वनस्पतियां हैं, उन्हें फिर से उगाएं। उनके सातत्य, शुचिता, प्रवाह और अविरल निर्मलता की चिंता करें।


डॉ. शोभना नारायण ने कहा, नदी केवल जलधारा नहीं, यह स्मृति है,  संस्कृति है, संस्कार है। यमुना की धारा में युगों का इतिहास बहता है। एक नृत्यांगना होने के नाते नदी से मेरी विशेष आत्मीयता स्वाभाविक है। नदी कभी स्थिर नहीं रहती, फिर भी उसमें निरंतरता है। नृत्य भी हमेशा गतिशील रहता है और गति में ही जन्म लेता है। नदी मुड़ती है, घूमती है, कभी वेग पकड़ती है, कभी शांत होती है और फिर आगे बढ़ जाती है और हमारा नृत्य भी वही करता है। स्थिरता और गति एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि एक प्रवाह में दो रूप हैं। नदी हमें प्रवाह का सौंदर्यशास्त्र सिखाती है। नदी की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा नहीं है, वह स्मृति, वह हमारी स्मृति और विरासत की रक्षा है।


श्री रामबहादुर राय ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि बरसात के पानी के अलावा जो भी जल यमुना में आता है, वह नालों और सीवर का आता है। उन्होंने दिल्ली के उपराज्यपाल सरदार तरनजीत सिंह संधू से यमुना को साफ किए जाने का आग्रह करते हुए कुछ सुझाव भी दिए। उन्होंने कहा, सबसे पहले यमुना में नालों का पानी गिराना बंद होना चाहिए। फिर दिल्ली में यमुना नदी के किनारे दोनों तरफ चौड़े नाले बनाए जाने चाहिए और नालों की सारी गंदगी, सीवर उसी में भेजा जाना चाहिए। फिर ओखला में एक बड़ा सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बनाकर, उसमें सारी गंदगी का शोधन किया जाए और साफ पानी यमुना में छोड़ा जाए। साथ दी दिल्ली में यमुना के किनारे पेड़ लगाए जाने चाहिए।  


इससे पूर्व, डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने अतिथियों और वक्ताओं का स्वागत करते हुए कहा, नदियां हमारी सस्कृति का अविभाज्य अंग हैं। नदी के किनारे रहने वाले लोगों का नदी से आत्मा का संबंध है। कालांतर में हमारी सोच यह हो गई कि नदियों से हमारा संबंध केवल दोहन का है। और इस सोच का परिणाम हम देख रहे हैं कि नदियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। नहियों को लेकर जागरूकता पैदा करने और मानस निर्माण के उद्देश्य से 2018 में हमने नदी उत्सव की शुरुआत की। 7वें नदी उत्सव में हमारे विमर्श के केन्द्र यमुना है। 
उद्घाटन अवसर पर नदी और भारतीय सांस्कृतिक चेतना के पारस्परिक संबंध को रेखांकित करते हुए वक्ताओं ने नदियों को केवल जलधारा न मानकर भारतीय सभ्यता, आस्था, लोकजीवन, कला, साहित्य और सामुदायिक स्मृति का अभिन्न आधार बताया। यमुना के संरक्षण के साथ-साथ उससे जुड़ी सांस्कृतिक और जीवंत परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।

 

लोकप्रिय