“नवरात्रि में आज साहस, शांति और दिव्य शक्ति की देवी मां चंद्रघंटा की करबद्ध वंदना!

नवरात्रि के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। माता के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जिसके कारण इन्हें ‘चंद्रघंटा’ कहा जाता है। देवी चंद्रघंटा के दस हाथ हैं, जिनमें खड्ग, बाण और अन्य अस्त्र-शस्त्र सुशोभित रहते हैं। मां का वाहन शेर है। मां का स्वरूप साहस, शौर्य, शांति और दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाला माना जाता है।
मां चंद्रघंटा साहस, शौर्य, शांति और दिव्य शक्ति की प्रतीक मानी जाती हैं। इनकी घंटे की गूंज से नकारात्मक शक्तियां और राक्षस दूर भागते हैं। मां की पूजा करने के दौरान लाल, सफेद, पीले या सुनहरे वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। मां चंद्रघंटा को लाल रंग के फूल, विशेष रूप से गुड़हल का फूल बहुत प्रिय है। मां चंद्रघंटा को दूध, खीर या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाया जाता है।
मां चंद्रघंटा का मंत्र, “पिंडजप्रवरारूढा, चंडकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं, चंद्रघंटेति विश्रुता।” है। इस मंत्र का हिंदी भावार्थ है कि श्रेष्ठ सिंह (या बाघ) पर सवार रहने वाली, भयंकर क्रोध और अस्त्र-शस्त्रों से युक्त तथा चंद्रघंटा के नाम से जानी जाने वाली मां दुर्गा मुझ पर अपनी कृपा और प्रसाद (आशीर्वाद) प्रदान करें।
नवदुर्गा में मां चंद्रघंटा का विशिष्ट स्थान
नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की क्रमशः उपासना की जाती है। प्रचलित नवदुर्गा परंपरा में मां शैलपुत्री प्रथम, मां ब्रह्मचारिणी द्वितीय और मां चंद्रघंटा तृतीय स्वरूप हैं। यह क्रम साधना की एक ऐसी यात्रा का संकेत देता है, जिसमें श्रद्धा और स्थिरता से आरंभ होकर तपस्या, अनुशासन, साहस और आत्मबल की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। मां शैलपुत्री का स्वरूप प्रकृति, स्थिरता और दृढ़ संकल्प से जुड़ा है। मां ब्रह्मचारिणी तप, त्याग और साधना की महत्ता को सामने रखती हैं। इसके बाद मां चंद्रघंटा का स्वरूप साधक को अपने भीतर की शक्ति पहचानने और जीवन की चुनौतियों का साहसपूर्वक सामना करने की प्रेरणा देता है।

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